Sambhal Shahi Jama Masjid case survey violence: अनुज चौधरी समेत 20 पुलिसवालों पर FIR के आदेश, पर कप्तान बोले- झुकेंगे नहीं…
Sambhal Shahi Jama Masjid case survey violence: उत्तर प्रदेश के संभल में शाही जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर विवाद ने एक बार फिर कानूनी और प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। मंगलवार को स्थानीय अदालत ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए चर्चित पुलिस अधिकारी अनुज चौधरी और उनके साथ करीब 15 से 20 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का सख्त आदेश दिया है। यह आदेश (Judicial intervention in police matters) की उस प्रक्रिया का हिस्सा है, जहां पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं। इस फैसले के बाद जिले के पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर उन अधिकारियों को निशाना बनाया गया है जो सर्वे के दौरान कानून व्यवस्था संभालने के लिए तैनात थे।

एसएसपी ने किया मातहतों का बचाव और हाईकोर्ट का रुख
अदालत के आदेश के तुरंत बाद संभल के एसएसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने अपने मातहतों का खुलकर पक्ष लिया है और साफ कर दिया है कि वे फिलहाल कोई केस दर्ज नहीं करेंगे। एसएसपी का तर्क है कि (Law enforcement legal protection) के तहत वे इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देंगे। पुलिस प्रमुख का मानना है कि उनके अधिकारियों ने विषम परिस्थितियों में अपनी ड्यूटी निभाई थी और उन पर मुकदमा दर्ज करना उनके मनोबल को प्रभावित कर सकता है। संभल पुलिस अब हाईकोर्ट में अपील दायर कर इस आदेश पर स्टे लेने की तैयारी में जुट गई है, जिससे यह कानूनी लड़ाई और लंबी खिंचने के आसार हैं।
24 नवंबर की वो काली तारीख और हिंसा का तांडव
संभल में मस्जिद के सर्वेक्षण के दौरान 24 नवंबर 2024 को भड़की हिंसा की यादें आज भी लोगों के जहन में ताजा हैं। उस दिन हुए पथराव और गोलीबारी में चार युवकों की जान चली गई थी, जबकि कई प्रशासनिक अधिकारी और पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए थे। इस (Communal tension and public unrest) की घटना ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रख दिया था। इसी हिंसा के दौरान नखासा क्षेत्र के खग्गू सराय निवासी आलम नामक युवक को भी गोली लगी थी, जिसकी याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेएम कोर्ट ने अब तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी और कोतवाल अनुज तोमर के खिलाफ एफआईआर का रास्ता साफ किया है।
पुलिस का दावा: सरकारी असलहों से नहीं चली गोली
एसएसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने मामले में एक बहुत ही महत्वपूर्ण तकनीकी दलील पेश की है, जो पुलिस को क्लीन चिट दिलाने की दिशा में बड़ी कड़ी हो सकती है। उन्होंने कहा कि हिंसा के दौरान घायलों के शरीर से मिली गोलियां 32 बोर की थीं, जबकि उत्तर प्रदेश पुलिस (Police weaponry and ballistics) में 32 बोर के हथियारों का इस्तेमाल नहीं करती है। पोस्टमार्टम और बैलिस्टिक रिपोर्ट के हवाले से एसएसपी ने दावा किया है कि पुलिस की तरफ से कोई ऐसी गोली नहीं चली जो प्रदर्शनकारियों को लगी हो। उनके मुताबिक, न्यायिक जांच आयोग भी अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप चुका है, जिसमें पुलिस की भूमिका पर स्थिति स्पष्ट की गई है।
घायल युवक आलम के परिवार की आपबीती
कोर्ट में याचिका दायर करने वाले आलम के पिता यामीन का पक्ष पुलिस के दावों से बिल्कुल अलग है। याचिका में यह दावा किया गया है कि जिस दिन हिंसा भड़की, आलम केवल बेकरी उत्पाद बेचने के लिए अपने घर से निकला था। परिजनों का कहना है कि गोली लगने के बाद (Allegations of excessive police force) के डर से उन्होंने पुलिस को सूचित करने के बजाय गुपचुप तरीके से एक निजी अस्पताल में उसका इलाज कराया। परिवार का आरोप है कि पुलिस ने जानबूझकर भीड़ पर सीधी फायरिंग की, जिसमें आलम गंभीर रूप से जख्मी हो गया था और उसे न्याय दिलाने के लिए उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
वकील की दलील और कानूनी प्रक्रिया का सफर
आलम के अधिवक्ता चौधरी अख्तर सादेन ने बताया कि उन्होंने 4 फरवरी 2025 को सीजेएम कोर्ट में न्याय के लिए गुहार लगाई थी। लंबी कानूनी प्रक्रिया और गवाहों के बयानों के बाद (Legal proceedings in criminal cases) के तहत 9 जनवरी 2026 को अंतिम सुनवाई पूरी हुई। अदालत ने मंगलवार को अपना आदेश सुनाते हुए तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, जो अब फिरोजाबाद में एएसपी (ग्रामीण) हैं, और अन्य पुलिसकर्मियों को आरोपी बनाने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का यह आदेश उन लोगों के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है जो पुलिसिया कार्रवाई को असंवैधानिक बता रहे थे।
अनुज चौधरी: विवादों और चर्चाओं के केंद्र में रहने वाले अफसर
अनुज चौधरी उत्तर प्रदेश पुलिस के एक ऐसे अधिकारी हैं जो अक्सर सुर्खियों में रहते हैं। चाहे वो खेल के मैदान में उनकी उपलब्धियां हों या फिर संभल जैसे संवेदनशील इलाकों में उनकी पोस्टिंग। संभल की हिंसा के बाद सोशल मीडिया पर उनके (Controversial police officers in UP) के रूप में कई वीडियो और पोस्टर भी वायरल हुए थे। वर्तमान में वे पदोन्नति पाकर फिरोजाबाद में अपर पुलिस अधीक्षक के रूप में तैनात हैं, लेकिन संभल की यह जांच और कोर्ट का आदेश उनके करियर के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है। पुलिस विभाग के भीतर और बाहर इस बात को लेकर बहस छिड़ी है कि क्या एक अधिकारी को अपनी ड्यूटी के दौरान लिए गए फैसलों के लिए अपराधी ठहराया जा सकता है।
संभल का भविष्य और कानून व्यवस्था की स्थिति
इस अदालती आदेश ने संभल में एक बार फिर पुराने जख्मों को कुरेद दिया है। जहां एक ओर पीड़ित पक्ष को न्याय की उम्मीद जगी है, वहीं दूसरी ओर पुलिस प्रशासन में इस आदेश के खिलाफ आक्रोश है। आने वाले दिनों में (Public safety and judicial accountability) के बीच का संतुलन कैसा रहेगा, यह हाईकोर्ट के रुख पर निर्भर करेगा। संभल का जामा मस्जिद मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रडार पर है, ऐसे में पुलिसकर्मियों पर मुकदमे का यह नया आदेश उत्तर प्रदेश की सियासत और कानून व्यवस्था को किस दिशा में ले जाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा।



