Sonam Wangchuk – सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य के आधार पर हिरासत पर पुनर्विचार का संकेत दिया
Sonam Wangchuk – सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की हिरासत को लेकर बुधवार को उच्चतम न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान गंभीर कानूनी और मानवीय सवाल सामने आए। न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने उनकी गिरती सेहत और लंबी अवधि की कैद का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार से मामले पर दोबारा विचार करने का सुझाव दिया। यह सुनवाई वांगचुक की पत्नी डॉ. गीतांजलि आंगमो द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर हुई, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 के तहत उनकी हिरासत को गैरकानूनी बताया गया है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वास्थ्य दोनों ही संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण विषय हैं, जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

हिरासत तक पहुंचने का घटनाक्रम
सोनम वांगचुक को 26 सितंबर को उस समय हिरासत में लिया गया था, जब लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। उस दौरान कुछ जगहों पर स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी, जिसके बाद प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए उन्हें हिरासत में ले लिया। बाद में सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें लद्दाख से जोधपुर स्थानांतरित कर दिया गया। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि यह कार्रवाई अनुपातहीन और असंवैधानिक थी, जबकि सरकार ने इसे सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक बताया है।
न्यायालय की तल्ख टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान जस्टिस पी.बी. वराले ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज से सीधा सवाल किया कि क्या सरकार वांगचुक की लगातार हिरासत की जरूरत पर, खासकर उनकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए, नए सिरे से विचार कर सकती है। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखना तब और संवेदनशील हो जाता है जब उसकी चिकित्सा स्थिति ठीक न हो। पीठ ने याद दिलाया कि हिरासत का आदेश लगभग पांच महीने से लागू है, जो अपने आप में समीक्षा की मांग करता है।
मेडिकल रिपोर्ट और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि वांगचुक की विशेषज्ञ चिकित्सा जांच से जुड़ा एक आवेदन पहले ही स्वीकार किया जा चुका है और उसकी रिपोर्ट न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा है। हालांकि रिपोर्ट के विवरण पर खुली अदालत में चर्चा नहीं की गई, लेकिन पीठ की टिप्पणियों से साफ झलक रहा था कि उनकी सेहत चिंता का विषय बनी हुई है। जस्टिस वराले ने कहा कि जब किसी बंदी की स्थिति “निश्चित रूप से बहुत अच्छी नहीं” है, तो मानवीय दृष्टिकोण से भी सरकार को अपने रुख पर पुनर्विचार करना चाहिए।
सरकार का पक्ष और आश्वासन
केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि यह मामला सरकार के लिए भी संवेदनशील है और वे संबंधित अधिकारियों से शीघ्र इस विषय पर चर्चा करेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि प्रशासन केवल कानूनी पहलुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवीय पहलुओं को भी ध्यान में रख रहा है। हालांकि उन्होंने हिरासत हटाने या उसमें ढील देने पर तत्काल कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं जताई।
कानूनी और लोकतांत्रिक मायने
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की हिरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के उपयोग और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन पर भी व्यापक बहस को जन्म देता है। अदालत की टिप्पणी यह दर्शाती है कि निवारक हिरासत के मामलों में भी अनुपातिकता, आवश्यकता और मानवीय गरिमा जैसे सिद्धांतों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका कार्यपालिका की शक्तियों पर निगरानी बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभा रही है।
लद्दाख के लिए व्यापक संदेश
लद्दाख में राज्य का दर्जा और स्थानीय अधिकारों को लेकर लंबे समय से मांगें उठती रही हैं। वांगचुक की हिरासत ने इस मुद्दे को फिर से राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है। कई सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों का कहना है कि संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए समाधान निकाला जाना चाहिए, न कि दंडात्मक कार्रवाई के माध्यम से। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणियों को इस दिशा में एक संतुलित संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
आगे की राह
अदालत ने फिलहाल कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है, लेकिन सरकार से पुनर्विचार की उम्मीद जताई है। आने वाले दिनों में इस मामले पर आगे की सुनवाई तय है, जिसमें वांगचुक की स्वास्थ्य रिपोर्ट और हिरासत की कानूनी वैधता पर विस्तार से चर्चा हो सकती है। इस बीच, उनकी रिहाई या वैकल्पिक व्यवस्था पर फैसला न सिर्फ कानूनी दृष्टि से बल्कि मानवीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगा



