LEMOA – भारत के सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल को लेकर क्या कहते हैं नियम…
LEMOA – ईरान के युद्धपोत IRIS Dena के डूबने की घटना के बाद भारत, ईरान और अमेरिका से जुड़े सामरिक समीकरणों को लेकर कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। कुछ रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि अमेरिका अपने सैन्य अभियानों के लिए भारत के ठिकानों पर निर्भर हो सकता है। हालांकि इन अटकलों को आधिकारिक स्तर पर खारिज किया गया है। दरअसल भारत और अमेरिका के बीच 2016 में एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ था, जिसके तहत दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे की कुछ सैन्य सुविधाओं का सीमित उपयोग कर सकती हैं। लेकिन इस व्यवस्था के तहत किसी भी कार्रवाई से पहले संबंधित देश की स्पष्ट अनुमति आवश्यक होती है।

भारत-अमेरिका समझौते की पृष्ठभूमि
भारत और अमेरिका के बीच 29 अगस्त 2016 को Logistics Exchange Memorandum of Agreement पर हस्ताक्षर किए गए थे। यह समझौता वॉशिंगटन डीसी में संपन्न हुआ था और इसका उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के बीच लॉजिस्टिक सहयोग को व्यवस्थित करना था। इस व्यवस्था के तहत दोनों पक्ष जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए हर बार अनुमति लेना अनिवार्य है।
रक्षा मामलों के जानकार बताते हैं कि यह समझौता अमेरिका द्वारा कई देशों के साथ किए गए लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट के समान है, हालांकि भारत के संदर्भ में इसे विशेष शर्तों के साथ लागू किया गया है।
किन सुविधाओं के उपयोग की अनुमति
इस समझौते के अंतर्गत नौसैनिक अड्डों, एयरफील्ड और अन्य सैन्य ठिकानों का सीमित उपयोग किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर जहाजों या विमानों को ईंधन भरने, मरम्मत कराने या जरूरी तकनीकी सहायता लेने के लिए इन सुविधाओं का उपयोग किया जा सकता है।
इसके अलावा सैन्य उपकरणों की आपूर्ति, रखरखाव और अन्य आवश्यक सेवाओं के लिए भी सहयोग किया जा सकता है। लेकिन किसी भी परिस्थिति में इन सुविधाओं का उपयोग स्वतः नहीं किया जा सकता, बल्कि हर बार दोनों देशों की सरकारों की सहमति जरूरी होती है।
समझौते के प्रमुख क्षेत्र
इस व्यवस्था के तहत मुख्य रूप से चार तरह की गतिविधियों को शामिल किया गया है। इनमें बंदरगाहों पर जहाजों का ठहराव, संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम और मानवीय सहायता या आपदा राहत से जुड़े अभियान शामिल हैं।
इन गतिविधियों के अलावा यदि किसी अन्य प्रकार की जरूरत सामने आती है तो उस पर भी दोनों देशों के बीच अलग से सहमति बनानी होती है। समझौते में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी सेवा के बदले भुगतान या समान लॉजिस्टिक सहायता प्रदान की जाएगी।
लॉजिस्टिक सहयोग में क्या-क्या शामिल
रक्षा समझौते के तहत मिलने वाली सुविधाओं में कई तरह की सेवाएं शामिल हैं। इनमें भोजन और पानी की व्यवस्था, आवास, परिवहन, ईंधन, तेल और अन्य तकनीकी सामग्री शामिल होती है। इसके अलावा संचार सेवाएं, चिकित्सा सहायता, उपकरणों का रखरखाव और मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता तथा प्रशिक्षण से जुड़ी सेवाएं भी इस सहयोग का हिस्सा हैं।
नौसैनिक जहाजों के लिए बंदरगाह सेवाएं, स्टोरेज और तकनीकी कैलिब्रेशन जैसी सुविधाएं भी इस व्यवस्था के तहत दी जा सकती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य सैन्य अभियानों के दौरान लॉजिस्टिक समर्थन को सरल बनाना है।
सैन्य अड्डों के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट प्रावधान
इस समझौते को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या इससे किसी देश को दूसरे देश के सैन्य अड्डों का स्थायी उपयोग करने की अनुमति मिल जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नहीं है। यह पूरी तरह लॉजिस्टिक सहयोग का ढांचा है और इसमें किसी भी देश को स्थायी सैन्य बेस स्थापित करने का अधिकार नहीं दिया गया है।
इसके अलावा यह समझौता किसी भी देश को संयुक्त सैन्य कार्रवाई करने के लिए बाध्य भी नहीं करता। हर स्थिति में संबंधित सरकार की मंजूरी और राजनीतिक निर्णय ही अंतिम माना जाता है।
क्षेत्रीय घटना का भारत के लिए महत्व
IRIS Dena से जुड़ी घटना को भारत के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह घटना उस समुद्री क्षेत्र में हुई जिसे भारत अपने रणनीतिक समुद्री पड़ोस का हिस्सा मानता है। हिंद महासागर क्षेत्र में श्रीलंका के दक्षिण का समुद्री इलाका वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्गों में शामिल है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि इस क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और समुद्री सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
भारत का आधिकारिक रुख
रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन डीके शर्मा के अनुसार जिस समय यह घटना हुई, उस समय संबंधित युद्धपोत भारत की समुद्री सीमा से बाहर था। हालांकि वह इससे पहले भारत में आयोजित नौसैनिक अभ्यास में शामिल होने आया था।
विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि भारत की नीति स्पष्ट है कि वह किसी भी देश को अपने सैन्य ठिकानों का उपयोग हमले के उद्देश्य से करने की अनुमति नहीं देगा। भारत आमतौर पर क्षेत्रीय स्थिरता और संतुलित कूटनीति को प्राथमिकता देता है।