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IranWarship – हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत डूबने के बाद बढ़ा कूटनीतिक दबाव

IranWarship – हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत के डूबने के बाद अब यह मामला सैन्य कार्रवाई से आगे बढ़कर कूटनीतिक दबाव और मानवीय जिम्मेदारी के मुद्दे में बदलता दिख रहा है। अमेरिका ने श्रीलंका सरकार से आग्रह किया है कि हालिया घटना में बचे ईरानी नौसैनिकों और श्रीलंका की हिरासत में मौजूद दूसरे ईरानी जहाज के चालक दल को फिलहाल ईरान वापस न भेजा जाए। इस घटनाक्रम ने क्षेत्रीय सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और मानवीय कानून से जुड़े कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

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अमेरिकी पनडुब्बी के हमले में डूबा ईरानी युद्धपोत

बुधवार को हिंद महासागर में श्रीलंका के दक्षिणी शहर गाले से करीब 19 समुद्री मील दूर ईरानी नौसेना का युद्धपोत आईआरआईएस देना अमेरिकी हमले का शिकार हो गया। जानकारी के अनुसार, एक अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो दागकर इस युद्धपोत को निशाना बनाया, जिसके बाद जहाज समुद्र में डूब गया।

इस हमले में 100 से अधिक ईरानी नौसैनिकों की मौत होने की खबर है, जबकि 32 लोगों को जीवित बचा लिया गया। बताया गया कि यह युद्धपोत हाल ही में बंगाल की खाड़ी में भारत द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास में शामिल होने के बाद ईरान लौट रहा था।

अमेरिकी प्रशासन के एक अधिकारी ने नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बताया कि हमले के समय यह जहाज पूरी तरह हथियारों से लैस था। अधिकारी के अनुसार, कार्रवाई से पहले कोई चेतावनी नहीं दी गई थी। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इस हमले को “शांत मौत” जैसी कार्रवाई बताया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार माना जा रहा है कि अमेरिका ने किसी सक्रिय युद्धपोत को इस तरह समुद्र में डुबोया है।

दूसरे ईरानी जहाज के चालक दल को श्रीलंका ने उतारा सुरक्षित

इसी बीच एक अन्य ईरानी नौसैनिक सहायक पोत आईआरआईएस बुशहर भी सुर्खियों में है। यह जहाज श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र में फंस गया था। गुरुवार को श्रीलंका की नौसेना ने जहाज से 208 चालक दल के सदस्यों को सुरक्षित उतारने की प्रक्रिया शुरू की।

श्रीलंकाई अधिकारियों के मुताबिक इस पोत को पूर्वी तट के एक बंदरगाह की ओर ले जाया जा रहा है। जहाज से उतारे गए अधिकांश नौसैनिकों को कोलंबो के पास स्थित एक नौसेना शिविर में रखा गया है।

सूत्रों के अनुसार, जब तक क्षेत्र में जारी तनाव की स्थिति बनी रहती है, तब तक इस जहाज को श्रीलंका की निगरानी में ही रखा जा सकता है। श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने कहा कि एक द्वीपीय राष्ट्र होने के नाते समुद्र में संकट में फंसे लोगों को शरण देना उनकी मानवीय जिम्मेदारी है।

अमेरिका और इजरायल की कूटनीतिक सक्रियता

घटना के बाद अमेरिका ने इस मामले में तेजी से कूटनीतिक पहल शुरू कर दी है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश विभाग के एक आंतरिक दस्तावेज में श्रीलंका से विशेष आग्रह किया गया है कि बचाए गए ईरानी नौसैनिकों और बुशहर के चालक दल को फिलहाल ईरान वापस न भेजा जाए।

कोलंबो में अमेरिकी दूतावास की प्रभारी जेन हॉवेल ने श्रीलंकाई अधिकारियों के साथ बातचीत में यह मुद्दा उठाया। अमेरिकी पक्ष ने यह भी चिंता जताई कि यदि इन नौसैनिकों को तुरंत ईरान भेजा गया तो तेहरान इस घटना का इस्तेमाल प्रचार के लिए कर सकता है।

बताया गया कि इस मुद्दे पर इजरायल भी कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय है। भारत और श्रीलंका के लिए नियुक्त इजरायली राजदूत के साथ हुई बातचीत में यह भी चर्चा हुई कि क्या इन ईरानी नौसैनिकों को पाला बदलने के लिए प्रेरित करने की कोई कोशिश की जा रही है या नहीं।

शवों की वापसी को लेकर ईरान का अनुरोध

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक मानवीय पहलू भी सामने आया है। श्रीलंका के स्वास्थ्य और जनसंचार उप मंत्री हंसका विजेमुनि ने बताया कि ईरान ने कोलंबो से संपर्क कर डूबे युद्धपोत के मृत नौसैनिकों के शव वापस भेजने में सहायता मांगी है।

हालांकि फिलहाल इस प्रक्रिया के लिए कोई निश्चित समय तय नहीं किया गया है। श्रीलंकाई अधिकारियों का कहना है कि मामले से जुड़े सभी पक्षों के साथ बातचीत के बाद ही आगे की कार्रवाई तय होगी।

अब तक इस मुद्दे पर अमेरिकी विदेश विभाग, श्रीलंका के राष्ट्रपति कार्यालय या कोलंबो स्थित इजरायली दूतावास की ओर से कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मामला समुद्री सुरक्षा, सैन्य कार्रवाई और मानवीय कानून के बीच संतुलन की चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

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