JudiciaryAppointments – कॉलेजियम प्रणाली की पारदर्शिता पर जस्टिस दत्ता की बढ़ी चिंता
JudiciaryAppointments – सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपांकर दत्ता ने उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता की कमी चिंताजनक है और इस व्यवस्था को अधिक स्पष्ट और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है। महिला दिवस के अवसर पर इंडियन वुमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने न्यायपालिका में नियुक्तियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर खुलकर अपनी बात रखी।

कॉलेजियम व्यवस्था की पारदर्शिता पर उठाए सवाल
अपने संबोधन में जस्टिस दत्ता ने कहा कि कॉलेजियम की कार्यप्रणाली इतनी अस्पष्ट है कि कई बार खुद न्यायाधीशों को भी यह स्पष्ट नहीं होता कि प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ रही है। उन्होंने आश्चर्य जताते हुए कहा कि कई मौकों पर जजों को यह तक जानकारी नहीं होती कि कॉलेजियम की बैठक कब और कहां हो रही है या किन नामों पर चर्चा चल रही है।
उन्होंने यह भी बताया कि कॉलेजियम के भीतर अलग-अलग राय सामने आने के बावजूद अंतिम निर्णय हमेशा उस असहमति को प्रतिबिंबित नहीं करते। हाल ही में हुई एक नियुक्ति का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एक महिला जज ने उस मामले में अपनी असहमति दर्ज कराई थी, लेकिन इसके बावजूद संबंधित नाम को मंजूरी दे दी गई।
न्यायिक नियुक्तियों में मेरिट को बताया सबसे अहम
न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी को लेकर चल रही बहस का जिक्र करते हुए जस्टिस दत्ता ने कहा कि इस मुद्दे को केवल संख्या के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार न्यायिक नियुक्तियों में किसी भी प्रकार का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व उचित नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि उच्च न्यायालयों में पदोन्नति की बात हो तो उनका ध्यान केवल योग्यता पर रहेगा, न कि इस बात पर कि कितने पद महिलाओं को मिलने चाहिए। उनके मुताबिक न्यायपालिका में जेंडर न्यूट्रैलिटी का अर्थ यह है कि चयन प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष हो और उम्मीदवार की क्षमता, ईमानदारी और न्यायिक दृष्टिकोण ही मुख्य आधार बनें।
बॉम्बे हाईकोर्ट के अनुभव से साझा किया उदाहरण
जस्टिस दत्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय नियुक्तियों के लिए कोई तय और वस्तुनिष्ठ मानदंड मौजूद नहीं थे। ऐसे में जजों को अक्सर अदालत में वकीलों की दलीलों और उनके पेशेवर प्रदर्शन के आधार पर ही उनकी योग्यता का आकलन करना पड़ता था।
उन्होंने एक घटना साझा करते हुए बताया कि किसी महिला वकील को केवल प्रतिनिधित्व के आधार पर पदोन्नति देने का सुझाव सामने आया था, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। उनके अनुसार उस वकील में उस समय आवश्यक परिपक्वता की कमी थी और उन्हें लगा कि उसे और अनुभव हासिल करने का समय मिलना चाहिए।
दबाव में निर्णय न लेने की बात
जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि कई बार हाईकोर्ट कॉलेजियम के कुछ न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के सुझावों को अस्वीकार करने में संकोच महसूस करते हैं। उनके अनुसार ऐसा नहीं होना चाहिए और हर मुख्य न्यायाधीश को स्वतंत्र रूप से अपने निर्णय पर कायम रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के रूप में उन्होंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि जब तक उन्हें किसी नाम को लेकर पूरी संतुष्टि न हो, तब तक वे सहमति नहीं देंगे। उनका मानना है कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया में दृढ़ता और निष्पक्षता बेहद जरूरी है।
कलकत्ता हाईकोर्ट की महिला जजों की सराहना
अपने वक्तव्य के दौरान जस्टिस दत्ता ने कलकत्ता हाईकोर्ट के अपने अनुभवों को भी याद किया। उन्होंने वहां कार्यरत कुछ महिला न्यायाधीशों की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे अपने काम में अत्यंत सक्षम और सशक्त हैं।
उन्होंने जस्टिस शम्पा सरकार, जस्टिस अमृता सिन्हा और जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य का उल्लेख करते हुए कहा कि वकालत के दिनों में उन्होंने इनसे कई कठिन सवाल पूछे थे। उनके मुताबिक उसी अनुभव ने उन्हें विश्वास दिलाया कि ये न्यायाधीश अदालत में आने वाले किसी भी जटिल मामले या वकील को पूरी मजबूती से संभालने में सक्षम हैं।



