DigitalDetox – सोशल मीडिया की अधिकता से बढ़ती मानसिक परेशानी पर विशेषज्ञों की चेतावनी
DigitalDetox – आज के दौर में सोशल मीडिया लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। कई लोग दिन का बड़ा हिस्सा मोबाइल पर रील्स देखने, पोस्ट स्क्रॉल करने या अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर समय बिताने में लगा देते हैं। सुबह उठते ही फोन चेक करना, सफर के दौरान सोशल मीडिया देखना और रात को सोने से पहले स्क्रीन पर समय बिताना अब सामान्य आदत बनती जा रही है। हालांकि मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदत धीरे-धीरे लोगों के मन और व्यवहार पर असर डाल सकती है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि कई बार लोग चिड़चिड़ापन, बेचैनी, थकान या ध्यान की कमी जैसी समस्याओं को काम के दबाव या निजी जीवन की परेशानियों से जोड़ते हैं। लेकिन वास्तविकता में लगातार सोशल मीडिया देखने की आदत भी इन समस्याओं का कारण बन सकती है। दूसरों की जिंदगी के चुने हुए और चमकदार पहलुओं को देखकर कई लोग अपनी तुलना करने लगते हैं, जिससे मानसिक तनाव बढ़ सकता है।
सोशल मीडिया का मानसिक स्थिति पर असर
दिल्ली की मनोचिकित्सक डॉ. पवित्रा शंकर के अनुसार सोशल मीडिया कई बार ऐसा वातावरण बना देता है, जहां लोग लाइक्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स जैसी चीजों को लेकर अत्यधिक चिंतित रहने लगते हैं। जब किसी व्यक्ति की अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, तो इससे निराशा और तनाव बढ़ सकता है।
उनका कहना है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली जिंदगी अक्सर पूरी सच्चाई नहीं होती। अधिकतर लोग अपने जीवन के सकारात्मक और आकर्षक पहलुओं को ही साझा करते हैं। लेकिन जब कोई व्यक्ति इन पोस्टों को लगातार देखता है, तो उसे लगता है कि उसकी अपनी जिंदगी उतनी अच्छी नहीं है। इससे आत्मविश्वास पर असर पड़ सकता है और कुछ मामलों में चिंता या अवसाद जैसी स्थिति भी बन सकती है।
नींद और ध्यान पर भी पड़ सकता है प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि देर रात तक मोबाइल का उपयोग करने से नींद की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। बहुत से लोग सोने से पहले सोशल मीडिया देखते रहते हैं, जिससे दिमाग लगातार सक्रिय बना रहता है। ऐसी स्थिति में मन शांत होने के बजाय अधिक उत्तेजित हो सकता है।
अगर इस दौरान कोई तनाव पैदा करने वाली खबर या वीडियो दिखाई दे जाए, तो दिमाग लंबे समय तक उसी के बारे में सोचता रहता है। इससे नींद आने में कठिनाई हो सकती है और अगले दिन ध्यान केंद्रित करने में भी समस्या हो सकती है। यही कारण है कि कई लोग लगातार थकान और एकाग्रता की कमी महसूस करते हैं।
क्या है डिजिटल डिटॉक्स और क्यों जरूरी
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल डिटॉक्स एक ऐसा तरीका है जिसमें कुछ समय के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाई जाती है। इसका उद्देश्य दिमाग को लगातार मिलने वाली जानकारी और उत्तेजना से थोड़ा विराम देना होता है।
डिजिटल डिटॉक्स के दौरान लोग अपने समय को पढ़ने, व्यायाम करने, परिवार के साथ समय बिताने या किसी रचनात्मक गतिविधि में लगाने की कोशिश करते हैं। इससे दिमाग को आराम मिलता है और व्यक्ति खुद पर ज्यादा ध्यान दे पाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ दिनों का यह विराम मानसिक संतुलन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।
सीमित उपयोग से मिल सकता है संतुलन
डॉ. पवित्रा शंकर का कहना है कि सोशल मीडिया अपने आप में नकारात्मक नहीं है। यह लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने, जानकारी साझा करने और विचार व्यक्त करने का प्रभावी माध्यम भी है। समस्या तब पैदा होती है जब इसका उपयोग जरूरत से ज्यादा होने लगता है।
अगर सोशल मीडिया का उपयोग सीमित समय के लिए किया जाए और बार-बार फोन चेक करने की आदत से बचा जाए, तो इसका नकारात्मक प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दिन में कुछ समय स्क्रीन से दूर रहकर वास्तविक जीवन की गतिविधियों पर ध्यान देना मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है।



