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ElectionUpdate – तमिलनाडु चुनाव में वीरप्पन परिवार की एंट्री से बढ़ी हलचल

ElectionUpdate – तमिलनाडु के आगामी विधानसभा चुनाव में एक ऐसा नाम फिर चर्चा में आ गया है, जिसे कभी जंगलों का सबसे कुख्यात चेहरा माना जाता था। चंदन तस्करी और आपराधिक गतिविधियों के लिए बदनाम रहे वीरप्पन का परिवार अब लोकतांत्रिक राजनीति के मैदान में उतर चुका है। उनकी बड़ी बेटी विद्या देवी मेत्तूर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रही हैं, जबकि उनकी पत्नी मुतुलक्ष्मी कृष्णागिरि से अपनी किस्मत आजमा रही हैं।

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परिवार की राजनीति में सक्रियता ने खींचा ध्यान

वीरप्पन के परिवार की इस राजनीतिक भागीदारी ने स्थानीय स्तर पर खासा ध्यान आकर्षित किया है। विद्या देवी जहां एक राजनीतिक दल के टिकट पर मैदान में हैं, वहीं उनकी मां भी क्षेत्रीय पार्टी से उम्मीदवार बनी हैं। दोनों ही ऐसे राजनीतिक दलों से जुड़ी हैं जो तमिल पहचान और क्षेत्रीय मुद्दों को प्रमुखता देते हैं। चुनावी सभाओं में इनकी मौजूदगी और भीड़ को देखते हुए यह साफ है कि लोगों में इनके प्रति उत्सुकता बनी हुई है।

पिता की छवि को लेकर अलग नजरिया

चुनावी मंचों से विद्या देवी और उनकी मां दोनों ही वीरप्पन की छवि को लेकर अलग दृष्टिकोण पेश कर रही हैं। उनका कहना है कि उनके पिता को एकतरफा तरीके से अपराधी के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि उनका संघर्ष कथित तौर पर अन्याय और शोषण के खिलाफ था। विद्या देवी ने एक सभा में कहा कि यदि उनके पिता आज जीवित होते, तो वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा जरूर बनते।

पहले भी आजमा चुकी हैं चुनावी मैदान

विद्या देवी इससे पहले 2024 के लोकसभा चुनाव में भी हिस्सा ले चुकी हैं, हालांकि उस समय उन्हें सफलता नहीं मिली थी। इसके बावजूद उन्होंने राजनीति से दूरी नहीं बनाई और लगातार सक्रिय बनी रहीं। दिलचस्प बात यह है कि वह पहले भारतीय जनता पार्टी से भी जुड़ी रही हैं, जहां उन्हें युवा इकाई में जिम्मेदारी दी गई थी। बाद में उन्होंने एक क्षेत्रीय दल का दामन थाम लिया।

पेशे से वकील, समाजसेवा से जुड़ाव

विद्या देवी पेशे से वकील हैं और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। खासतौर पर आदिवासी और दलित समुदाय के अधिकारों को लेकर उन्होंने कई अभियानों में भाग लिया है। उनके समर्थकों का कहना है कि उनकी जमीनी पकड़ और सामाजिक कार्य उन्हें चुनाव में मजबूती दे सकते हैं। हालांकि, विरोधी दल इस मुद्दे को लेकर सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या सिर्फ पारिवारिक पहचान के आधार पर राजनीति में सफलता मिल सकती है।

वीरप्पन का अतीत और विवादित विरासत

वीरप्पन, जिनका पूरा नाम कूज मुनिस्वामी वीरप्पन था, दक्षिण भारत के जंगलों में दशकों तक सक्रिय रहे। उन पर चंदन तस्करी, हाथियों के शिकार और कई हत्याओं के आरोप लगे। कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल की पुलिस लंबे समय तक उनकी तलाश में रही। वर्ष 2004 में एक विशेष अभियान के दौरान उनका अंत हुआ। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उनके नाम कई गंभीर अपराध दर्ज थे, जिससे उनकी छवि बेहद विवादित रही।

चुनावी समीकरणों पर संभावित असर

विश्लेषकों का मानना है कि वीरप्पन परिवार की चुनावी मौजूदगी कुछ क्षेत्रों में वोटों के समीकरण को प्रभावित कर सकती है। खासकर उन इलाकों में जहां स्थानीय पहचान और भावनात्मक मुद्दे अहम भूमिका निभाते हैं। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता उनके अतीत और वर्तमान के बीच किसे ज्यादा महत्व देते हैं।

जनता की प्रतिक्रिया मिश्रित

स्थानीय लोगों के बीच इस मुद्दे को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे लोकतंत्र की ताकत मानते हैं, जहां हर व्यक्ति को मौका मिलता है, जबकि अन्य लोग इसे विवादित विरासत से जोड़कर देखते हैं। चुनाव परिणाम ही तय करेंगे कि जनता इस नए राजनीतिक प्रयोग को कितना स्वीकार करती है।

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