अंतर्राष्ट्रीय

USIranTalks – मध्यस्थता की कोशिशों में पाकिस्तान पर बढ़े सवाल, कूटनीतिक दौरे तेज

USIranTalks – अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थ बनने की कोशिशें अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकीं, जिससे उसकी भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। शुरुआती दौर की बातचीत के बाद किसी ठोस सहमति का न बन पाना इस दिशा में एक बड़ा झटका माना जा रहा है। अब पाकिस्तान इस स्थिति से उबरने के लिए नए कूटनीतिक प्रयासों में जुटा है और इसी क्रम में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस सप्ताह सऊदी अरब और तुर्किये की यात्रा पर जा रहे हैं।

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कूटनीतिक सक्रियता बढ़ाने की कोशिश

प्रधानमंत्री का यह दौरा केवल औपचारिक यात्रा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पाकिस्तान की व्यापक रणनीति का हिस्सा समझा जा रहा है। इस रणनीति के तहत पाकिस्तान खुद को एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में स्थापित करना चाहता है। हालांकि, हाल की रिपोर्टों से संकेत मिला है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही वार्ता के लिए वैकल्पिक स्थानों पर विचार कर रहे हैं, जिससे इस्लामाबाद की भूमिका सीमित होती नजर आ रही है।

रणनीति पर राष्ट्रपति से चर्चा

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने जानकारी दी कि प्रधानमंत्री ने उन्हें अपनी कूटनीतिक योजना के बारे में विस्तार से बताया है। इस योजना में विभिन्न देशों के साथ संपर्क बढ़ाकर वार्ता को आगे बढ़ाने और संवाद की प्रक्रिया को बनाए रखने पर जोर दिया गया है। साथ ही, प्रमुख वैश्विक ताकतों के साथ संवाद बनाए रखना भी इस रणनीति का अहम हिस्सा बताया गया है, ताकि किसी भी स्तर पर बातचीत की संभावनाएं खत्म न हों।

युद्धविराम के बीच फिर से वार्ता की उम्मीद

पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच रुकी हुई बातचीत को फिर से शुरू करने के प्रयास जारी हैं। सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि मौजूदा युद्धविराम की अवधि समाप्त होने से पहले दोनों पक्ष एक बार फिर बातचीत की मेज पर लौट सकते हैं। इस दिशा में पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व, जिसमें प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, उप प्रधानमंत्री इशाक डार और सैन्य नेतृत्व शामिल हैं, सक्रिय रूप से प्रयास कर रहे हैं।

इस्लामाबाद में हाल ही में हुई उच्च स्तरीय बैठकों में भी संकेत मिले हैं कि वार्ता के अगले चरण की तैयारी चल रही है। हालांकि, इन प्रयासों की सफलता कई बाहरी कारकों पर निर्भर करेगी।

पहले दौर की बातचीत से नहीं निकला समाधान

इससे पहले अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच इस्लामाबाद में हुई सीधी बातचीत को एक महत्वपूर्ण कदम माना गया था। लगभग पांच दशकों बाद दोनों देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने आए थे और लंबी चर्चा भी हुई। अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे थे, जबकि ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद-बघर ग़ालिबफ़ शामिल हुए थे।

हालांकि, यह वार्ता किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी। बातचीत के बाद अमेरिकी पक्ष ने संकेत दिया कि अब आगे की पहल ईरान को करनी होगी। इस स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि जटिल मुद्दों का समाधान केवल एक दौर की बातचीत से संभव नहीं है।

क्षेत्रीय भूमिका को लेकर चुनौतियां बरकरार

पाकिस्तान के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी कूटनीतिक विश्वसनीयता को बनाए रखने की है। मध्यस्थता की भूमिका निभाना केवल बातचीत की मेजबानी तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसके लिए सभी पक्षों का भरोसा भी जरूरी होता है। मौजूदा परिस्थितियों में पाकिस्तान को अपने प्रयासों को और मजबूत करने की जरूरत होगी।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या पाकिस्तान अपने कूटनीतिक प्रयासों से दोनों देशों को एक साझा मंच पर ला पाता है या फिर यह भूमिका किसी अन्य देश के हाथ में चली जाती है।

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