HighCourt – देरी पर सख्त रुख, खारिज हुई यूपी सरकार की 11 अपीलें…
HighCourt – इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक अहम फैसले में उत्तर प्रदेश सरकार को झटका देते हुए उसकी 11 विशेष अपीलों को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि अपील दाखिल करने में हुई देरी को लेकर सरकार संतोषजनक कारण नहीं बता सकी। इस निर्णय के बाद लोक निर्माण विभाग के कई जूनियर इंजीनियरों को राहत मिली है, जिनकी सेवा शर्तों और पेंशन से जुड़ा मामला लंबे समय से लंबित था।

अदालत ने देरी के तर्कों को नहीं माना
मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि सभी अपीलें निर्धारित समयसीमा के बाद दाखिल की गई थीं। इन अपीलों में देरी 93 दिनों से लेकर 195 दिनों तक की थी। राज्य सरकार की ओर से इस देरी के लिए फाइलों के लंबित रहने, विभागीय प्रक्रियाओं, छुट्टियों और विधानसभा सत्र जैसे कारण गिनाए गए। हालांकि अदालत ने इन तर्कों को पर्याप्त नहीं माना।
प्रशासनिक सुस्ती पर अदालत की टिप्पणी
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि सरकारी संस्थानों के पास संसाधनों और व्यवस्थित तंत्र की कमी नहीं होती, इसलिए केवल प्रक्रियागत देरी का हवाला देकर समयसीमा का उल्लंघन उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर इस तरह की देरी को स्वीकार किया जाए, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया में अनिश्चितता बढ़ेगी और अन्य पक्षकारों के अधिकार प्रभावित होंगे।
इंजीनियरों को मिला बड़ा लाभ
इस फैसले का सीधा असर उन जूनियर इंजीनियरों पर पड़ा है, जिन्हें 1984 से 1989 के बीच दैनिक वेतन या वर्क चार्ज कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया गया था। पहले उन्हें वर्ष 2006 से नियमित माना जा रहा था, लेकिन एकल पीठ ने अपने आदेश में इसे बदलकर 2001 से विनियमित करने का निर्देश दिया था। अब खंडपीठ द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद यह आदेश बरकरार रहेगा।
पुरानी पेंशन योजना का रास्ता साफ
वर्ष 2001 से सेवा नियमित माने जाने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि संबंधित इंजीनियर अब पुरानी पेंशन योजना के दायरे में आ सकेंगे। इससे उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। लंबे समय से इस मुद्दे को लेकर इंजीनियरों में असमंजस की स्थिति बनी हुई थी, जो अब काफी हद तक समाप्त हो गई है।
एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी गई थी
राज्य सरकार ने 9 सितंबर 2025 को एकल पीठ द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ इन विशेष अपीलों को दायर किया था। इस फैसले में राम गोपाल गुप्ता समेत कई याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय दिया गया था। सरकार ने इस आदेश को बदलवाने की कोशिश की, लेकिन समय पर अपील दाखिल न कर पाने के कारण उसकी दलीलें अदालत में टिक नहीं सकीं।
न्यायिक प्रक्रिया में समयसीमा का महत्व
अदालत ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि किसी भी अपील पर विचार करते समय सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह होता है कि देरी के पीछे उचित कारण मौजूद है या नहीं। केवल प्रशासनिक ढिलाई को आधार बनाकर समयसीमा का उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ ही अदालत ने सभी विलंब माफी याचिकाएं खारिज कर दीं, जिससे अपीलें स्वतः निरस्त हो गईं।