LegalDispute – टाटा ट्रस्ट्स की अहम बैठक को हाई कोर्ट में मिली चुनौती
LegalDispute – टाटा ट्रस्ट्स की प्रस्तावित बैठक को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट में कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। बुधवार को दायर एक रिट याचिका में शुक्रवार को होने वाली महत्वपूर्ण बैठक पर रोक लगाने की मांग की गई। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सर रतन टाटा ट्रस्ट की मौजूदा संरचना महाराष्ट्र के संशोधित सार्वजनिक ट्रस्ट कानून के अनुरूप नहीं है। इसी आधार पर सितंबर 2025 के बाद लिए गए निर्णयों को भी अवैध घोषित करने की मांग की गई है।

कानून के उल्लंघन का आरोप
यह याचिका सुरेश तुलसीराम पाटीलखेड़े ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल की है। याचिका में कहा गया है कि महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट संशोधन अधिनियम 2025 के अनुसार किसी ट्रस्ट में स्थायी या आजीवन ट्रस्टियों की संख्या कुल सदस्यों के एक-चौथाई से अधिक नहीं हो सकती। आरोप है कि सर रतन टाटा ट्रस्ट में यह अनुपात तय सीमा से काफी ज्यादा है।
याचिका के अनुसार ट्रस्ट में फिलहाल छह ट्रस्टी हैं, जिनमें तीन आजीवन ट्रस्टी शामिल हैं। इस स्थिति में स्थायी ट्रस्टियों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत हो जाती है, जबकि कानून अधिकतम 25 प्रतिशत की अनुमति देता है। अदालत से आग्रह किया गया है कि जब तक बोर्ड का पुनर्गठन नहीं हो जाता, तब तक किसी भी नए फैसले पर रोक लगाई जाए।
बैठक के फैसलों पर पड़ सकता है असर
अगर अदालत तत्काल हस्तक्षेप करती है तो शुक्रवार को होने वाली बैठक टल सकती है। यह बैठक इसलिए अहम मानी जा रही है क्योंकि इसमें टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्टों के प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा प्रस्तावित है। अभी टाटा ट्रस्ट्स की ओर से नोएल टाटा और वेनु श्रीनिवासन बोर्ड में शामिल हैं।
टाटा ट्रस्ट्स का देश के सबसे बड़े कारोबारी समूह टाटा संस में बड़ा हिस्सा है। रिपोर्टों के मुताबिक सर रतन टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस में 23.56 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि सभी टाटा ट्रस्ट्स की कुल हिस्सेदारी करीब 66 प्रतिशत बताई जाती है। ऐसे में ट्रस्ट से जुड़े फैसलों का कारोबारी असर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कौन हैं याचिकाकर्ता
याचिका दायर करने वाले सुरेश पाटीलखेड़े ठाणे के निवासी हैं और कुछ निजी कंपनियों में निदेशक पद पर हैं। सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी हिस्सा लिया था। उन्होंने अदालत में दावा किया है कि सार्वजनिक ट्रस्ट होने के कारण टाटा ट्रस्ट्स के मामलों में आम नागरिक को भी कानूनी चुनौती देने का अधिकार है।
स्थायी ट्रस्टियों पर उठे सवाल
याचिका में कहा गया है कि ट्रस्ट के तीन स्थायी ट्रस्टियों में जिमी टाटा, जहांगीर एच.सी. जहांगीर और नोएल टाटा शामिल हैं। जिमी टाटा को वर्ष 1989 में आजीवन ट्रस्टी बनाया गया था। स्थायी ट्रस्टी होने का मतलब यह होता है कि उन्हें बार-बार चयन प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि ट्रस्ट को तीन स्थायी ट्रस्टियों को बनाए रखना है, तो बोर्ड का आकार बढ़ाकर 12 सदस्य करना होगा। मौजूदा छह सदस्यीय बोर्ड में केवल एक स्थायी ट्रस्टी की अनुमति दी जा सकती है।
इन लोगों को बनाया गया पक्षकार
मामले में महाराष्ट्र सरकार, चैरिटी कमिश्नर और सर रतन टाटा ट्रस्ट को पक्षकार बनाया गया है। इसके अलावा नोएल टाटा, वेनु श्रीनिवासन, विजय सिंह, जिमी टाटा, जहांगीर जहांगीर और दारियस खंबाता को भी प्रतिवादी के रूप में शामिल किया गया है।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि सितंबर 2025 के बाद लिए गए सभी बड़े फैसलों की वैधता की जांच की जाए। इनमें कुछ ट्रस्टियों को हटाने और दोबारा नियुक्ति न देने से जुड़े फैसले भी शामिल हैं।