Court Verdict – विवाह के वादे पर बने संबंधों पर हाईकोर्ट ने की अहम टिप्पणी
Court Verdict – इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहमति से बने संबंधों और विवाह के वादे से जुड़े मामलों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि हर टूटे रिश्ते को दुष्कर्म के मामले के रूप में नहीं देखा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी संबंध की शुरुआत आपसी सहमति से हुई हो और शुरुआत में धोखा देने की मंशा साबित न हो, तो बाद में विवाह से इनकार करने मात्र से दुष्कर्म का मामला स्वतः नहीं बनता। यह फैसला न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने सुनाया।

समन आदेश और पूरी कार्यवाही रद्द
मामला मुरादाबाद से जुड़ा था, जहां एक महिला की शिकायत के आधार पर कपिल सोम और अन्य लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया गया था। निचली अदालत ने आरोपों पर संज्ञान लेते हुए समन जारी किया था, लेकिन हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद उस आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने यह भी कहा कि उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए पूरे मुकदमे को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का अनुचित उपयोग माना जाएगा।
सोशल मीडिया से शुरू हुआ था संपर्क
शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि उसकी आरोपी से पहचान इंस्टाग्राम के जरिए हुई थी। महिला के अनुसार आरोपी ने शादी का भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में विवाह से इनकार कर दिया। शिकायत में यह भी कहा गया कि आरोपी और उसके परिवार के लोगों ने उसके साथ मारपीट की, जातिसूचक बातें कहीं और आर्थिक रूप से भी परेशान किया। महिला ने आरोपी के पिता पर भी गंभीर आरोप लगाए थे।
सहमति आधारित संबंधों पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी रिश्ते का बाद में समाप्त हो जाना और शुरुआत से झूठे इरादे से रिश्ता बनाना, दोनों अलग परिस्थितियां हैं। अदालत ने माना कि दुष्कर्म का अपराध तभी माना जाएगा जब यह स्पष्ट रूप से साबित हो कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं रखा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा आश्वासन दिया गया था।
कोर्ट ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि महिला बालिग और शिक्षित थी तथा वह अपनी इच्छा से आरोपी के संपर्क में आई थी। दोनों लंबे समय तक साथ रहे और अलग-अलग स्थानों पर भी साथ रहने की बात सामने आई। अदालत के अनुसार उपलब्ध साक्ष्यों से यह प्रतीत नहीं होता कि संबंध जबरन बनाए गए थे या शुरुआत में धोखा देने की कोई स्पष्ट योजना थी।
हर असफल रिश्ता आपराधिक मामला नहीं
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि हर असफल प्रेम संबंध को दुष्कर्म के मुकदमे में बदल दिया जाए, तो इससे न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा। कोर्ट ने माना कि लंबे समय तक चले सहमति आधारित रिश्तों में बाद में लगाए गए आरोपों की जांच तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर सावधानी से की जानी चाहिए।
बीएनएस और एससी-एसटी एक्ट पर भी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया, वे वर्ष 2022 और 2023 की हैं, जबकि नया कानून जुलाई 2024 से लागू हुआ है। ऐसे में इस कानून को पुराने मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता।
एससी/एसटी एक्ट से जुड़े आरोपों पर अदालत ने कहा कि शिकायत और बयानों में सार्वजनिक स्थान पर जातिसूचक अपमान के स्पष्ट तथ्य सामने नहीं आए। केवल विवाह से इनकार करने या जाति का उल्लेख होने भर से इस कानून की धाराएं स्वतः लागू नहीं हो जातीं।
सभी परिस्थितियों और उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा जारी समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।