Panchayat Election – हाईकोर्ट पहुंचा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का मामला
Panchayat Election – उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव से पहले ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने का मुद्दा अब न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है। राज्य सरकार के हालिया आदेश को चुनौती देते हुए लखनऊ स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ में जनहित याचिका दायर की गई है। अदालत ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से विस्तृत पक्ष प्रस्तुत करने को कहा है। इस मामले पर आगे की सुनवाई बुधवार को निर्धारित की गई है।

याचिका में राज्य सरकार के उस आदेश पर सवाल उठाए गए हैं, जिसके तहत मौजूदा ग्राम प्रधानों को उनके कार्यकाल की समाप्ति के बाद भी ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह व्यवस्था पंचायत कानून की मूल भावना के अनुरूप नहीं है।
अदालत ने मांगा सरकार का पक्ष
यह मामला अवकाशकालीन पीठ के समक्ष रखा गया, जिसमें न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार के अधिवक्ता को निर्देश दिया कि वे संबंधित विभाग से आवश्यक जानकारी और दिशा-निर्देश प्राप्त कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें।
याचिका में कहा गया है कि पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल कानून के अनुसार निर्धारित अवधि तक ही सीमित होता है। ऐसे में चुनाव न होने की स्थिति में उन्हें प्रशासक के रूप में बनाए रखने की वैधता पर प्रश्न उठाया गया है।
25 मई के आदेश को दी गई चुनौती
जनहित याचिका में राज्य सरकार द्वारा 25 मई को जारी किए गए आदेश को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि पंचायत राज व्यवस्था में निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित है और इसके बाद नई चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से नए प्रतिनिधियों का चयन होना चाहिए।
उनका आरोप है कि समय पर चुनाव न होने के बावजूद पुराने प्रधानों को प्रशासनिक अधिकार देना कानूनी प्रावधानों की भावना से मेल नहीं खाता।
कार्यकाल पूरा होने के बाद लिया गया फैसला
उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का निर्धारित कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया था। इसके बाद राज्य सरकार ने आदेश जारी कर उन्हें अस्थायी रूप से प्रशासक की भूमिका में कार्य जारी रखने की अनुमति दी। सरकार का तर्क है कि पंचायत चुनाव होने तक ग्राम पंचायतों का नियमित संचालन बनाए रखना आवश्यक है।
इस व्यवस्था के तहत पूर्व ग्राम प्रधान अपनी पंचायतों के प्रशासनिक कार्यों को संभाल रहे हैं, ताकि स्थानीय स्तर पर विकास और जनसेवाओं का काम प्रभावित न हो।
पहली बार अपनाई गई यह व्यवस्था
जानकारों के अनुसार, राज्य में पहली बार ऐसी व्यवस्था लागू की गई है, जिसमें कार्यकाल पूरा होने के बाद ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इससे पहले ऐसी परिस्थितियों में प्रशासनिक अधिकारियों को अस्थायी जिम्मेदारी दिए जाने की परंपरा रही है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था केवल सीमित अवधि के लिए लागू रहेगी। नए पंचायत चुनाव संपन्न होने या अधिकतम छह माह की अवधि पूरी होने तक यह व्यवस्था प्रभावी रह सकती है।
पंचायत चुनाव में देरी बनी वजह
राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव समय पर न हो पाने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। प्रशासनिक स्तर पर चुनावी प्रक्रिया की तैयारियों और अन्य कारणों के चलते चुनाव कार्यक्रम अभी घोषित नहीं किया गया है। इसी बीच पंचायतों के संचालन को जारी रखने के लिए यह अंतरिम व्यवस्था लागू की गई।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस फैसले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अब इस मामले में अदालत की टिप्पणी और निर्णय पर सभी की नजरें टिकी हैं।
अन्य स्थानीय निकायों को लेकर भी अटकलें
ग्राम प्रधानों से जुड़े फैसले के बाद यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों के मामले में भी इसी तरह की व्यवस्था लागू की जा सकती है। जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों का कार्यकाल भी आने वाले हफ्तों में समाप्त होने वाला है।
हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। भविष्य में सरकार क्या निर्णय लेती है, इस पर स्थानीय निकायों से जुड़े प्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों की नजर बनी हुई है।