उत्तराखण्ड

RTI – पति पर निगरानी के शक में महिला पहुंची सूचना आयोग

RTI – देहरादून में एक अनोखा मामला सामने आया है, जहां एक महिला ने अपने पति पर निगरानी रखने का संदेह होने पर उसे साबित करने के लिए सूचना के अधिकार कानून का सहारा लिया। महिला ने शहर में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज हासिल करने की कोशिश की, ताकि वह अपने दावे के समर्थन में सबूत जुटा सके। हालांकि तकनीकी कारणों के चलते उसे यह जानकारी नहीं मिल सकी और मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंच गया।

rti cctv footage information case

महिला का कहना था कि उसके पति का व्यवहार लंबे समय से उसे परेशान कर रहा था। उसे आशंका थी कि पति उसकी गतिविधियों पर नजर रखता है और उसका पीछा भी करता है। इसी संदेह को स्पष्ट करने के लिए उसने पुलिस से सार्वजनिक स्थानों पर लगे कैमरों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था।

कई महीने पुरानी घटना से जुड़ा था मामला

जानकारी के अनुसार प्रेमनगर क्षेत्र की रहने वाली महिला ने दावा किया कि 13 अक्टूबर 2025 को दर्शनलाल चौक से घंटाघर के बीच उसके पति ने उसका पीछा किया था। महिला का आरोप था कि इस दौरान पति ने मोबाइल फोन से उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी की थी। जब उसने बाद में इस बारे में सवाल किया तो पति ने ऐसे किसी भी व्यवहार से इनकार कर दिया।

महिला को लगा कि यदि सड़क मार्ग पर लगे कैमरों की रिकॉर्डिंग मिल जाए तो वह वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकेगी। इसी उद्देश्य से उसने 7 फरवरी 2026 को सूचना के अधिकार के तहत देहरादून पुलिस से संबंधित क्षेत्र की सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराने का अनुरोध किया।

पुलिस ने तकनीकी कारण बताते हुए किया इनकार

शहर में यातायात प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था के लिए विभिन्न स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। इन कैमरों की रिकॉर्डिंग निगरानी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। महिला को उम्मीद थी कि इन्हीं कैमरों की मदद से वह अपने आरोपों की पुष्टि कर पाएगी।

हालांकि पुलिस विभाग ने जवाब में बताया कि मांगी गई फुटेज उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। विभाग का कहना था कि जिस तारीख की रिकॉर्डिंग मांगी जा रही है, वह काफी पुरानी हो चुकी है और निर्धारित अवधि के बाद सिस्टम से हट चुकी है। इस जवाब से असंतुष्ट होकर महिला ने राज्य सूचना आयोग में अपील दायर की।

सूचना आयोग में सामने आया तकनीकी पक्ष

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सूचना आयोग ने संबंधित लोक सूचना अधिकारी से जवाब मांगा। सुनवाई में बताया गया कि स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत स्थापित कैमरों की रिकॉर्डिंग सीमित अवधि तक ही सुरक्षित रहती है। सिस्टम में ऑटो-डिलीट व्यवस्था लागू है, जिसके तहत लगभग 30 दिनों बाद पुराना डेटा स्वतः हट जाता है।

अधिकारी ने आयोग को अवगत कराया कि संबंधित आवेदन घटना के करीब चार महीने बाद किया गया था। ऐसे में उस अवधि की रिकॉर्डिंग पहले ही सिस्टम से हट चुकी थी और उसे दोबारा उपलब्ध कराना संभव नहीं था।

उपलब्ध रिकॉर्ड तक ही सीमित है सूचना का अधिकार

सुनवाई के बाद सूचना आयोग ने स्पष्ट किया कि सूचना के अधिकार कानून के तहत केवल वही जानकारी प्रदान की जा सकती है, जो किसी विभाग के पास रिकॉर्ड के रूप में मौजूद हो। यदि कोई दस्तावेज, रिकॉर्डिंग या डिजिटल डेटा निर्धारित प्रक्रिया के तहत पहले ही नष्ट या डिलीट हो चुका है, तो उसे पुनः तैयार कर उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।

तकनीकी तथ्यों और विभागीय रिकॉर्ड को देखते हुए आयोग ने महिला की अपील स्वीकार नहीं की। इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि सार्वजनिक निगरानी प्रणालियों में डेटा कितने समय तक सुरक्षित रखा जाता है और नागरिकों को सूचना प्राप्त करने के लिए समयसीमा का ध्यान रखना कितना आवश्यक है।

Back to top button

Adblock Detected

Please remove AdBlocker first, and then watch everything easily.