OilMarket – G7 की सख्ती के संकेतों से भारत के तेल आयात पर बढ़ी चिंता
OilMarket – फ्रांस के एवियन-लेस-बैंस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान रूस-यूक्रेन युद्ध एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गया है। अमेरिका और अन्य G7 देशों के हालिया संकेतों ने भारत समेत उन देशों की चिंता बढ़ा दी है जो पिछले कुछ समय से रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि वैश्विक तेल आपूर्ति की स्थिति सामान्य होने के बाद रूस पर ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े प्रतिबंधों को फिर से कड़ा किया जा सकता है।

तेल बाजार की स्थिति बदलने के बाद बदला रुख
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान वैश्विक तेल बाजार को झटके से बचाने के लिए कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी राहत दी गई थी। उस समय आशंका थी कि तेल आपूर्ति बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। अब जबकि हॉर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल परिवहन की स्थिति पहले की तुलना में बेहतर बताई जा रही है, अमेरिका रूस पर दोबारा आर्थिक दबाव बढ़ाने की तैयारी में दिखाई दे रहा है।
ट्रंप ने सम्मेलन के दौरान कहा कि तेल आपूर्ति मार्गों में सुधार होने के बाद प्रतिबंधों को फिर से प्रभावी बनाने की संभावना बढ़ गई है। इससे रूस की ऊर्जा आय पर असर डालने की रणनीति को आगे बढ़ाया जा सकता है।
G7 देशों ने बढ़ाया दबाव
सम्मेलन में शामिल कई देशों ने रूस की ऊर्जा आय सीमित करने के प्रयासों को तेज करने पर सहमति जताई है। ब्रिटेन और कनाडा ने उन जहाजों और नेटवर्क के खिलाफ नए कदमों की घोषणा की है जिनका इस्तेमाल रूसी तेल के परिवहन और व्यापार के लिए किया जाता है। G7 देशों का मानना है कि ऊर्जा निर्यात से होने वाली आय रूस की युद्ध क्षमता को समर्थन देती है, इसलिए इस स्रोत पर दबाव बढ़ाना आवश्यक है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला
भारत दुनिया के प्रमुख कच्चे तेल आयातक देशों में शामिल है और हाल के वर्षों में रूस से बड़े पैमाने पर रियायती तेल खरीदता रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच रूसी तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को लागत नियंत्रित रखने में मदद की है। ऐसे में यदि अमेरिकी प्रतिबंधों से जुड़ी छूट समाप्त होती है या नियम अधिक कठोर बनाए जाते हैं, तो भारतीय कंपनियों के लिए आयात और भुगतान प्रक्रियाएं अधिक जटिल हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में भारत को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश बढ़ानी पड़ सकती है, जिससे आयात लागत पर भी असर पड़ सकता है। इसका प्रभाव घरेलू ईंधन बाजार और ऊर्जा सुरक्षा की रणनीतियों पर भी दिखाई दे सकता है।
17 जून की समयसीमा पर नजर
रूसी तेल से संबंधित अस्थायी राहत की अवधि 17 जून को समाप्त होने वाली बताई गई है। बाजार और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विश्लेषक इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि अमेरिका आगे राहत बढ़ाता है या प्रतिबंधों को फिर से कड़ा करने का फैसला लेता है। इस निर्णय का असर केवल भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार पर भी पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने उठाई व्यापार मार्गों की चिंता
G7 सम्मेलन में आमंत्रित भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का मुद्दा उठाया। उन्होंने पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान समुद्री परिवहन में आई चुनौतियों और उसके आर्थिक प्रभावों का उल्लेख किया। भारत लगातार यह रुख रखता रहा है कि वैश्विक व्यापार मार्गों की स्थिरता विश्व अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
यूक्रेन ने और प्रतिबंधों की मांग की
सम्मेलन में मौजूद यूक्रेनी राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की ने रूस पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बनाने की आवश्यकता दोहराई। उन्होंने कहा कि रूस को वार्ता की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए कड़े प्रतिबंध प्रभावी माध्यम हो सकते हैं। साथ ही उन्होंने अपने देश की सुरक्षा जरूरतों के लिए सहयोगी देशों से अतिरिक्त रक्षा सहायता का भी अनुरोध किया।
रूस से भारत का आयात बढ़ा
यूरोपीय शोध संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की रिपोर्ट के अनुसार, मई 2026 में भारत रूस से जीवाश्म ईंधन खरीदने वाले देशों में दूसरे स्थान पर रहा। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि रूस से भारत का कुल कच्चे तेल और अन्य ईंधनों का आयात लगभग 6.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, कुल आयात में सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का रहा, जबकि तेल उत्पादों और कोयले की खरीद भी महत्वपूर्ण स्तर पर दर्ज की गई। मई के दौरान भारत के कुल कच्चे तेल आयात में वृद्धि का एक प्रमुख कारण रूस से आयात में आई उल्लेखनीय बढ़ोतरी रही।