PoliceAction – विरोध प्रदर्शन पर तड़ीपार आदेश रद्द, हाई कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल
PoliceAction – बम्बई हाई कोर्ट ने एक राजनीतिक कार्यकर्ता के खिलाफ जारी तड़ीपार (जिलाबदर) आदेश को निरस्त करते हुए कहा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अपनी असहमति व्यक्त करने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सरकारी नीतियों के विरोध में प्रदर्शन करना किसी व्यक्ति को शहर से बाहर करने का पर्याप्त आधार नहीं बन सकता। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जा सकता मानो वे सरकार के अधीन गुलाम हों।

याचिका पर सुनवाई के बाद मिला राहत का आदेश
समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला न्यायमूर्ति माधव जामदार की एकल पीठ ने सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी की याचिका पर सुनाया। चौधरी ने दिसंबर 2025 में पुलिस उपायुक्त द्वारा जारी तड़ीपार आदेश को चुनौती दी थी। बाद में मार्च 2026 में कोंकण संभाग के आयुक्त ने भी उस आदेश को बरकरार रखा था। अब हाई कोर्ट ने दोनों आदेशों को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की है।
किन मामलों के आधार पर हुई थी कार्रवाई
पुलिस की ओर से दायर रिकॉर्ड के अनुसार, चौधरी के खिलाफ दर्ज पांच प्राथमिकी को आधार बनाकर तड़ीपार की कार्रवाई की गई थी। इन मामलों का संबंध नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), ज्ञानवापी मस्जिद विवाद और केंद्र सरकार के कुछ अन्य फैसलों के विरोध में आयोजित धरनों और प्रदर्शनों से जुड़ा बताया गया था। पुलिस का कहना था कि इन गतिविधियों से कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी।
अदालत ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दिया जोर
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति माधव जामदार ने कहा कि किसी भी नागरिक को सरकार की नीतियों का विरोध करने और अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने टिप्पणी की कि केवल सरकार या उसके नेताओं के खिलाफ नारे लगाने को तड़ीपार जैसी कठोर कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि पुलिस का दायित्व कानून का पालन कराना है, न कि किसी राजनीतिक नेतृत्व के हितों की रक्षा करना।
मौलिक अधिकारों का किया गया उल्लेख
अपने आदेश में अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है। न्यायालय के अनुसार, याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई कार्रवाई इन अधिकारों को प्रभावित करती है। अदालत ने माना कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और इसे अपने आप में गैरकानूनी गतिविधि नहीं माना जा सकता।
चुनावी अवधि में क्षेत्र से बाहर रहने का भी उठाया मुद्दा
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि तड़ीपार आदेश के कारण उन्हें स्थानीय चुनाव के दौरान अपने क्षेत्र से बाहर रहना पड़ा, जिससे राजनीतिक और संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर प्रभावित हुआ। अदालत ने इस पहलू पर भी ध्यान दिया और कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इस तरह की कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती। अंततः हाई कोर्ट ने पुलिस उपायुक्त और संभागीय आयुक्त के आदेशों को निरस्त करते हुए मामले का निपटारा कर दिया।