Legend – दारा सिंह की ताकत, आज भी यादगार है अभिनय और हनुमान की अमर पहचान
Legend- भारतीय टेलीविजन इतिहास में जब भी रामानंद सागर की ‘रामायण’ का जिक्र होता है, तो भगवान हनुमान के रूप में दारा सिंह की छवि स्वतः सामने आ जाती है। अपनी असाधारण शारीरिक क्षमता, कुश्ती की उपलब्धियों और प्रभावशाली अभिनय के दम पर उन्होंने ऐसी पहचान बनाई, जो दशकों बाद भी लोगों के मन में कायम है। उनका जीवन खेल, सिनेमा और अनुशासन का अनोखा संगम माना जाता है।

कम उम्र में परिवार की जिम्मेदारी संभाली
पंजाब के धरमूचक गांव में जन्मे दारा सिंह का विवाह पारिवारिक परंपरा के अनुसार बेहद कम उम्र में बच्चू कौर से कर दिया गया था। किशोरावस्था में ही वह पिता बन गए और शुरुआती दिनों से ही परिवार की जिम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गईं। मजबूत कद-काठी के कारण फिल्म उद्योग में शुरुआत आसान नहीं रही। कई कलाकार उनके व्यक्तित्व को लेकर संकोच करते थे, लेकिन उन्होंने अपने आत्मविश्वास और मेहनत से यह धारणा बदल दी।
कुश्ती की दुनिया में बनाई अलग पहचान
दारा सिंह का नाम भारत के पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले पेशेवर पहलवानों में लिया जाता है। उन्होंने अपने करियर के दौरान अनेक मुकाबलों में जीत दर्ज की और लंबे समय तक अपराजित रहने का रिकॉर्ड कायम रखा। उनके सबसे चर्चित मुकाबलों में मशहूर रेसलर किंग कॉन्ग के खिलाफ जीत शामिल है, जिसके बाद उनकी लोकप्रियता देश की सीमाओं से बाहर भी फैल गई। इसी दौर में उन्हें ‘रुस्तम-ए-हिंद’ जैसी प्रतिष्ठित उपाधि से भी सम्मानित किया गया।
अनुशासित जीवन और खास खानपान
दारा सिंह अपनी फिटनेस को लेकर बेहद सजग रहते थे। नियमित व्यायाम के साथ उनका खानपान भी काफी संतुलित और ऊर्जा से भरपूर माना जाता था। दूध, सूखे मेवे और प्रोटीन युक्त भोजन उनकी दिनचर्या का हिस्सा थे। शूटिंग के दौरान भी वह अपनी डाइट में किसी तरह की लापरवाही नहीं करते थे। उनके साथ काम कर चुके लोगों के अनुसार, अखाड़े में जितने सख्त दिखाई देते थे, निजी जीवन में उतने ही सरल और मिलनसार स्वभाव के इंसान थे।
हनुमान के किरदार के लिए दिखाई पूरी निष्ठा
जब रामानंद सागर ने ‘रामायण’ के लिए हनुमान का किरदार प्रस्तावित किया, तब दारा सिंह ने अपनी उम्र का हवाला देकर शुरुआती संकोच जताया था। हालांकि निर्माता के आग्रह पर उन्होंने यह भूमिका स्वीकार की। इस किरदार को पूरी श्रद्धा और गंभीरता के साथ निभाने के लिए उन्होंने अपनी जीवनशैली में भी बदलाव किया। बताया जाता है कि उन्होंने मांसाहार छोड़कर शाकाहारी भोजन अपनाया और हर दिन पात्र की तैयारी के लिए अभ्यास किया। हनुमान का मेकअप तैयार होने में रोज कई घंटे लगते थे, जबकि संस्कृतनिष्ठ संवादों के कारण बाद में डबिंग कलाकार की भी मदद ली गई।
दर्शकों ने अभिनेता नहीं, आस्था का प्रतीक माना
1986 में ‘रामायण’ के प्रसारण के बाद दारा सिंह की लोकप्रियता अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई। देशभर में लोग उन्हें केवल अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि भगवान हनुमान की छवि के रूप में देखने लगे। सार्वजनिक कार्यक्रमों में अनेक लोग उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते थे। उनके बेटे विंदू दारा सिंह ने भी कई साक्षात्कारों में बताया है कि उनके पिता इस भूमिका के प्रति इतने समर्पित थे कि शूटिंग के बाद भी लंबे समय तक उसी भाव में बने रहते थे और नियमित रूप से संवादों का अभ्यास करते थे।
अंतिम समय तक अमर रही उनकी विरासत
जुलाई 2012 में दारा सिंह को हृदय संबंधी गंभीर समस्या के बाद मुंबई के अस्पताल में भर्ती कराया गया। उपचार के दौरान उनकी स्थिति लगातार गंभीर बनी रही। चिकित्सकों की सलाह पर उन्हें बाद में घर ले जाया गया, जहां 12 जुलाई 2012 को उन्होंने अपने परिवार के बीच अंतिम सांस ली। कुश्ती के अखाड़े से लेकर भारतीय सिनेमा और टेलीविजन तक उनका योगदान आज भी प्रेरणा का स्रोत माना जाता है। विशेष रूप से ‘रामायण’ में निभाया गया उनका हनुमान का किरदार भारतीय टीवी इतिहास की सबसे यादगार प्रस्तुतियों में शामिल है।