CrudeOil – लाल सागर तनाव के बीच कच्चे तेल में तेज उछाल, कई उद्योगों पर बढ़ सकता है लागत का दबाव
CrudeOil – लाल सागर क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। हूती विद्रोहियों की ओर से तेल टैंकरों को निशाना बनाए जाने और मध्य पूर्व में बढ़ती अस्थिरता के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। ब्रेंट क्रूड मई के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से ऊपर पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 92 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि आपूर्ति पर दबाव बना रहा तो आने वाले दिनों में कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।

अमेरिका की चेतावनी से बढ़ी बाजार की चिंता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लाल सागर में जहाजों पर हो रहे हमलों को लेकर ईरान और हूती विद्रोहियों को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि यदि समुद्री मार्गों पर हमले जारी रहते हैं तो अमेरिका सख्त कार्रवाई कर सकता है। एक मीडिया इंटरव्यू में उन्होंने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की संभावना पर भी विचार करने की बात कही। इस बयान के बाद वैश्विक बाजार में निवेशकों की चिंता और बढ़ गई है।
आपूर्ति बाधित होने की आशंका
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर जैसे अहम समुद्री मार्गों पर दिखाई दे रहा है। इन रास्तों से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और एलपीजी की आपूर्ति होती है। हूती हमलों के कारण तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका ने सप्लाई चेन को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है, जिसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पड़ रहा है।
120 डॉलर तक पहुंचने की संभावना
Infrastructure Capital Management के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जे हैटफील्ड का मानना है कि यदि लाल सागर में जहाजों की आवाजाही गंभीर रूप से प्रभावित होती है तो कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। उनके अनुसार समुद्री परिवहन में व्यवधान बढ़ने पर सुरक्षा व्यवस्था की लागत भी बढ़ेगी, जिसका असर अंततः तेल की कीमतों में दिखाई देगा।
रूस और काला सागर क्षेत्र की स्थिति भी बनी चुनौती
ऊर्जा बाजार पर दबाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है। रूस के काला सागर तट स्थित कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम टर्मिनल पर हुए हमलों ने भी आपूर्ति संबंधी चिंताओं को बढ़ाया है। इस टर्मिनल के जरिए कजाकिस्तान के अधिकांश तेल का निर्यात होता है। लगातार बने भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक तेल भंडार पर भी दबाव बढ़ रहा है, जिससे आने वाले समय में बाजार की अस्थिरता बनी रह सकती है।
किन क्षेत्रों पर पड़ सकता है सबसे अधिक असर
यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो सबसे पहले परिवहन और ईंधन से जुड़े क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से सड़क परिवहन, लॉजिस्टिक्स और माल ढुलाई की लागत बढ़ने की संभावना है, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
एविएशन सेक्टर में एयर टर्बाइन फ्यूल (ATF) महंगा होने से एयरलाइंस के परिचालन खर्च बढ़ सकते हैं, जिससे हवाई किराए और कंपनियों के लाभ पर असर पड़ने की आशंका है।
पेंट, प्लास्टिक, केमिकल और पैकेजिंग उद्योग भी पेट्रोकेमिकल आधारित कच्चे माल पर निर्भर हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसी तरह टेक्सटाइल उद्योग में पॉलिएस्टर और अन्य सिंथेटिक फाइबर की लागत पर भी दबाव बढ़ने की संभावना है।
कृषि और निर्माण गतिविधियां भी हो सकती हैं प्रभावित
महंगे डीजल का असर खेती-किसानी पर भी पड़ सकता है। ट्रैक्टर, सिंचाई पंप और फसलों की ढुलाई में ईंधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इससे कृषि लागत बढ़ने के साथ खाद्य महंगाई पर भी अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।
सीमेंट, स्टील और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में भारी मशीनरी, परिवहन और बिटुमेन जैसे पेट्रोलियम उत्पादों का व्यापक उपयोग होता है। ऐसे में कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतें निर्माण परियोजनाओं की कुल लागत को भी प्रभावित कर सकती हैं।