Uttarakhand Himgiri Plantation Fraud Case: 25 साल की तलाश खत्म, उत्तराखंड पुलिस के हत्थे चढ़ा हिमगिरी प्लांटेशन केस का मास्टरमाइंड
Uttarakhand Himgiri Plantation Fraud Case: उत्तराखंड के चमोली जिले से जुड़ा एक पुराना ठगी मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। वर्ष 2001 से फरार चल रहे ‘हिमगिरी प्लांटेशन’ ठगी कांड के मुख्य आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यह गिरफ्तारी न सिर्फ कानून की लंबी लड़ाई का अहम मोड़ है, बल्कि उन निवेशकों के लिए भी उम्मीद की किरण है, जिनकी मेहनत की कमाई इस घोटाले में फंस गई थी। पुलिस की इस कार्रवाई को (cold case breakthrough) के रूप में देखा जा रहा है।

एसओजी की सटीक कार्रवाई से मिली सफलता
पुलिस अधीक्षक सुरजीत सिंह पंवार ने जानकारी दी कि फरार आरोपी रविंद्र मोहन को स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप की टीम ने रुद्रप्रयाग जिले के फाटा क्षेत्र से दबोचा। आरोपी बीते कई वर्षों से अपनी पहचान छिपाकर अलग-अलग स्थानों पर रह रहा था। गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस ने जाल बिछाया और उसे पकड़ने में कामयाबी हासिल की। यह गिरफ्तारी (SOG operation) की सटीक रणनीति का नतीजा मानी जा रही है।
अब भी फरार है दूसरा आरोपी
एसपी पंवार के अनुसार इस बहुचर्चित मामले में दूसरा आरोपी राकेश मोहन अब भी फरार है। पुलिस ने उसकी तलाश तेज कर दी है और संभावित ठिकानों पर लगातार दबिश दी जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि रविंद्र मोहन की गिरफ्तारी से राकेश मोहन तक पहुंचने में भी अहम सुराग मिल सकते हैं। यह स्थिति (absconding accused) को लेकर पुलिस की चुनौती को दर्शाती है।
शिकायत से शुरू हुई थी पूरी कहानी
इस ठगी मामले की शुरुआत वर्ष 2001 में हुई थी, जब गोपेश्वर थाने में शिव प्रसाद नामक व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि रविंद्र मोहन और उसके भाई राकेश मोहन ने निवेश के नाम पर लोगों से लाखों रुपये ठगे। इस शिकायत के बाद मामला दर्ज हुआ, लेकिन आरोपी गिरफ्त से बाहर रहे। यह पूरा घटनाक्रम (FIR complaint) की अहमियत को रेखांकित करता है।
क्या था हिमगिरी प्लांटेशन घोटाला
शिकायत के मुताबिक दोनों भाइयों ने वर्ष 1993 में ‘हिमगिरी प्लांटेशन’ नाम से एक कंपनी बनाई थी। इस कंपनी के जरिए लोगों को कम समय में पैसा दोगुना करने और भारी मुनाफा देने का लालच दिया गया। शुरुआत में कुछ निवेशकों को लाभ दिखाया गया, जिससे और लोग जुड़ते चले गए। बाद में यह पूरा मॉडल ठगी साबित हुआ। यह तरीका (investment fraud) का क्लासिक उदाहरण माना जा रहा है।
लाखों रुपये लेकर हो गए थे फरार
वर्ष 2001 तक आते-आते कंपनी के जरिए बड़ी रकम जुटा ली गई और इसके बाद दोनों आरोपी अचानक गायब हो गए। निवेशकों को न तो पैसा वापस मिला और न ही कंपनी का कोई अता-पता रहा। लंबे समय तक लोग अपने पैसे के लिए दर-दर भटकते रहे। इस ठगी ने कई परिवारों की आर्थिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित किया, जो (financial loss) की गंभीरता को दर्शाता है।
IPC की धाराओं में दर्ज हुआ था केस
पुलिस ने शिकायत के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) और 420 (धोखाधड़ी) के तहत मामला दर्ज किया था। इसके बाद दोनों आरोपियों को फरार घोषित कर दिया गया। चमोली के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी किए थे। यह कानूनी प्रक्रिया (criminal proceedings) का अहम चरण थी।
सालों तक नहीं मिला था कोई सुराग
एसपी पंवार ने बताया कि इतने वर्षों तक आरोपियों का कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया था। वे लगातार ठिकाने बदलते रहे और पुलिस से बचते रहे। समय के साथ मामला ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा था, लेकिन पुलिस ने इसे पूरी तरह बंद नहीं किया। यह स्थिति (long pending case) की जटिलता को उजागर करती है।
निजी कार्यक्रम बना गिरफ्तारी की वजह
हाल ही में पुलिस को सूचना मिली कि रविंद्र मोहन अपने मूल क्षेत्र में एक निजी कार्यक्रम में शामिल हो सकता है। इसी सूचना के आधार पर पुलिस ने पूरी योजना बनाई और सही समय पर कार्रवाई की। जैसे ही आरोपी फाटा क्षेत्र में पहुंचा, उसे हिरासत में ले लिया गया। यह सूचना आधारित कार्रवाई (intelligence input) की सफलता मानी जा रही है।
कोर्ट में पेशी के बाद भेजा गया जेल
गिरफ्तारी के बाद आरोपी को संबंधित न्यायालय में पेश किया गया। अदालत ने उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। अब पुलिस उससे पूछताछ के जरिए यह जानने की कोशिश करेगी कि ठगी की रकम कहां गई और इसमें और कौन-कौन शामिल था। यह चरण (judicial custody) के तहत जांच को आगे बढ़ाने वाला है।
पीड़ितों में फिर जगी न्याय की उम्मीद
इस गिरफ्तारी के बाद ठगी के शिकार हुए निवेशकों में एक बार फिर न्याय की उम्मीद जगी है। लोगों का मानना है कि अगर दोनों आरोपी पकड़े जाते हैं तो शायद उन्हें अपनी मेहनत की कमाई वापस मिलने की कोई राह निकले। यह मामला (victim justice) के नजरिए से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
राकेश मोहन की तलाश तेज
पुलिस अधीक्षक ने साफ किया है कि फरार आरोपी राकेश मोहन को पकड़ने के लिए अभियान और तेज किया गया है। संभावित ठिकानों पर निगरानी बढ़ा दी गई है और तकनीकी मदद भी ली जा रही है। पुलिस को भरोसा है कि जल्द ही दूसरा आरोपी भी कानून के शिकंजे में होगा। यह प्रयास (manhunt operation) का अगला अहम चरण है।
कानून की लंबी लेकिन निर्णायक लड़ाई
हिमगिरी प्लांटेशन ठगी मामला यह साबित करता है कि भले ही न्याय मिलने में देर हो, लेकिन कानून का शिकंजा ढीला नहीं पड़ता। 25 साल बाद हुई यह गिरफ्तारी एक मिसाल है कि अपराधी कितने भी समय तक छिपा रहे, अंततः उसे जवाब देना ही पड़ता है। यह पूरा मामला (justice delayed) की बहस में नया अध्याय जोड़ता है।