Bangladesh Political Crisis: क्या रंग लाएगा पड़ोसी मुल्क की सुलगती आग और लोकतंत्र का दम घुटता शोर…
Bangladesh Political Crisis: बांग्लादेश में मौजूदा हालात केवल राजनीतिक अस्थिरता का संकेत नहीं हैं, बल्कि यह वहां की लोकतांत्रिक जड़ों पर एक गहरा प्रहार है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पड़ोसी देश में प्रेस के खिलाफ बढ़ती (freedom of the press) हिंसा पर गहरी संवेदना और चिंता व्यक्त की है। थरूर का मानना है कि जब किसी देश में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया जाता है, तो वह केवल अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला नहीं, बल्कि उस राष्ट्र के बहुलतावाद और सामाजिक ढांचे को नष्ट करने की कोशिश होती है।

प्रमुख मीडिया संस्थानों को बनाया जा रहा है निशाना
सोशल मीडिया के माध्यम से थरूर ने बताया कि ‘प्रोथोम आलो’ और ‘द डेली स्टार’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के कार्यालयों पर हुए सुनियोजित हमले बेहद डरावने हैं। यह (targeted attacks) इस बात का प्रमाण हैं कि वहां अराजक तत्व अब बुद्धिजीवियों और सूचना के स्रोतों को पूरी तरह समाप्त करना चाहते हैं। संपादक महफूज अनाम और उनके सहयोगी पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर उठते सवाल इस बात की पुष्टि करते हैं कि वहां का माहौल अब पत्रकारों के काम करने के योग्य नहीं रह गया है।
भारतीय मिशनों का बंद होना और आम जनता की त्रासदी
हिंसा का प्रभाव केवल बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भारत के साथ उसके संबंधों पर भी पड़ रहा है। सुरक्षा खतरों के कारण खुलना और राजशाही में भारतीय सहायक उच्चायोग का (diplomatic mission) कामकाज बंद होना एक गंभीर चिंता का विषय है। इस फैसले से सबसे ज्यादा वे गरीब परिवार, छात्र और मरीज प्रभावित होंगे जो इलाज या शिक्षा के लिए भारत पर निर्भर रहते हैं। यह स्थिति दोनों देशों के बीच मानवीय संबंधों में एक बड़ी बाधा बनकर उभरी है।
चुनावी भविष्य और अस्थिरता का काला साया
बांग्लादेश में आगामी 12 फरवरी 2026 को प्रस्तावित चुनावों को लेकर भी अब संशय के बादल मंडराने लगे हैं। थरूर ने स्पष्ट किया है कि जिस तरह की (democratic process) असहिष्णुता और हिंसा वर्तमान में देखी जा रही है, वह किसी भी निष्पक्ष चुनाव के लिए घातक है। लोकतंत्र में जनता की आवाज मतपेटी के जरिए आनी चाहिए, लेकिन वहां फिलहाल भीड़ तंत्र का शोर ज्यादा सुनाई दे रहा है। अगर माहौल ऐसा ही रहा, तो एक पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराना असंभव हो जाएगा।
अंतरिम सरकार के लिए थरूर की दो-टूक सलाह
शांति बहाली के लिए थरूर ने यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को कड़े कदम उठाने का सुझाव दिया है। उनका कहना है कि (interim government) को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि देश में पत्रकारों को अपनी जान बचाने के लिए गुहार न लगानी पड़े। किसी भी सभ्य समाज में भीड़ तंत्र को कानून से ऊपर होने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सरकार की पहली प्राथमिकता कानून-व्यवस्था को बहाल करना और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना होना चाहिए।
राजनयिक सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मर्यादा का सवाल
अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत किसी भी देश में मौजूद दूतावास और वाणिज्य दूतावास सुरक्षित क्षेत्र होने चाहिए। थरूर ने जोर देकर कहा कि (security threats) को देखते हुए राजनयिक मिशनों को अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया कराई जानी चाहिए ताकि देशों के बीच संपर्क बना रहे। यदि दूतावास ही सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो अंतरराष्ट्रीय संवाद पूरी तरह टूट जाएगा, जिससे बांग्लादेश अलग-थलग पड़ सकता है। मुख्य सलाहकार यूनुस को इस दिशा में नेतृत्वकारी भूमिका निभानी होगी।
कट्टरपंथ का खौफनाक चेहरा और मानवीय संवेदनाओं का कत्ल
बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद शुरू हुई हिंसा ने अब एक बेहद डरावना रूप अख्तियार कर लिया है। हाल ही में एक हिंदू युवक की नृशंस हत्या और उसके शव को सार्वजनिक रूप से (communal violence) जलाए जाने की घटना ने रोंगटे खड़े कर दिए हैं। कट्टरपंथी तत्व न केवल भारत को निशाना बना रहे हैं, बल्कि वे अल्पसंख्यकों और उदारवादी आवाजों को कुचलने का काम कर रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि वहां कट्टरवाद की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।
दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए बांग्लादेश का शांत होना जरूरी
शशि थरूर का मानना है कि बांग्लादेश में स्थिरता केवल उस देश के लिए नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए अनिवार्य है। एक (stable neighborhood) ही क्षेत्रीय विकास की नींव होता है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि बांग्लादेश जल्द ही इस संक्रमण काल से बाहर निकलेगा और वहां एक ऐसा सुरक्षित वातावरण बनेगा जहां हिंसा और डर की जगह संवाद और शांति को प्राथमिकता दी जाएगी। जनता का भरोसा फिर से लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बहाल करना ही एकमात्र रास्ता है



