Bihar Congress Organizational Rebranding: क्या बिहार कांग्रेस में होने जा रहा है अब तक का सबसे बड़ा सियासी ऑपरेशन…
Bihar Congress Organizational Rebranding: बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में एक बड़ा भूचाल ला दिया है। करारी हार का सामना करने के बाद अब पार्टी आलाकमान ने हार का ठीकरा स्थानीय नेतृत्व पर फोड़ने की पूरी तैयारी कर ली है। पार्टी के भीतर इस बात को लेकर गहरी चिंता है कि बूथ स्तर पर संगठन उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाया। इसी (Political Accountability Framework) के तहत अब जिला और प्रखंड स्तर के नेताओं की कार्यक्षमता की बारीकी से जांच की जा रही है। नेतृत्व ने साफ संकेत दिए हैं कि अब केवल पद पर बैठे रहने वाले नेताओं के दिन लद गए हैं और प्रदर्शन ही एकमात्र पैमाना होगा।

निष्क्रिय पदाधिकारियों पर गिरेगी अनुशासन की गाज
बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष राजेश राम ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि संगठन (Bihar Congress Organizational Rebranding) में अब किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने जिला पर्यवेक्षकों को यह विशेष कार्य सौंपा है कि वे उन जिलाध्यक्षों और प्रखंड अध्यक्षों की पहचान करें जो चुनाव के दौरान या उससे पहले निष्क्रिय रहे थे। ऐसे नेताओं की (Administrative Restructuring Process) के जरिए छुट्टी की जाएगी और उनकी जगह उन समर्पित कार्यकर्ताओं को मौका दिया जाएगा जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी का झंडा बुलंद रखा। इस कदम से पार्टी के भीतर उन लोगों में खौफ है जो लंबे समय से पदों पर जमे हुए हैं।
सदाकत आश्रम में बनी 9 जनवरी की डेडलाइन
पटना स्थित बिहार कांग्रेस के मुख्यालय सदाकत आश्रम में गुरुवार को एक महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। इस बैठक की अध्यक्षता करते हुए प्रदेश अध्यक्ष ने पर्यवेक्षकों को सख्त निर्देश दिए कि वे अपने-अपने क्षेत्रों का दौरा कर 9 जनवरी तक विस्तृत रिपोर्ट मुख्यालय में जमा करें। इस (Strategic Planning Meeting) में संगठन की आगामी कार्ययोजना और अब तक किए गए कार्यों की विस्तृत समीक्षा की गई। पार्टी का मानना है कि समय रहते अगर कमजोर कड़ियों को नहीं हटाया गया, तो भविष्य की चुनावी राह और भी कठिन हो जाएगी।
बूथ स्तर पर किलेबंदी को मजबूत करने का संकल्प
राजेश राम ने बैठक के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया कि पार्टी को केवल जिला मुख्यालयों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने निर्देश दिया कि संगठन को बूथ स्तर तक ले जाकर उसे और अधिक प्रभावशाली बनाया जाए। जनसमस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर उठाना और पार्टी की नीतियों को आम जनता तक (Effective Communication Strategy) के माध्यम से पहुंचाना अब अनिवार्य होगा। इसके साथ ही सदस्यता अभियान और जनसंपर्क कार्यक्रमों में तेजी लाने के लिए भी नई रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया ताकि खोए हुए जनाधार को वापस पाया जा सके।
वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी और भविष्य का रोडमैप
इस महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक में बिहार कांग्रेस के कई दिग्गज नेता शामिल हुए। राजेश राठौड़, प्रवीण सिंह कुशवाहा और कमलदेव नारायण शुक्ला जैसे नेताओं ने अपने अनुभव साझा किए और संगठन में जान फूंकने के सुझाव दिए। बैठक में (Grassroots Leadership Development) पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही गई ताकि आने वाले समय में पार्टी के पास एक मजबूत विकल्प मौजूद हो। नेताओं का मानना है कि जनता के बीच पैठ बनाने के लिए संगठन का ढांचा पारदर्शी और सक्रिय होना बेहद जरूरी है।
दिल्ली के दरबार में गूंजी बगावत की आवाज
एक तरफ जहां पटना में संगठन को मजबूत करने की बैठकें चल रही हैं, वहीं दूसरी ओर बिहार कांग्रेस का एक बड़ा असंतुष्ट गुट दिल्ली में डेरा डाले हुए है। ये बागी नेता प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरु और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम की कार्यशैली से बेहद खफा हैं। उन्होंने दिल्ली पहुंचकर (High Command Intervention) की मांग की है। असंतुष्टों का कहना है कि मौजूदा नेतृत्व के रहते बिहार में कांग्रेस का पुनरुद्धार संभव नहीं है, इसलिए शीर्ष नेतृत्व को तुरंत हस्तक्षेप कर कमान में बदलाव करना चाहिए।
राहुल और प्रियंका गांधी तक पहुंची नेतृत्व परिवर्तन की मांग
दिल्ली में मौजूद असंतुष्ट गुट ने अपनी मांगों को लेकर एक औपचारिक ज्ञापन सौंपा है। यह ज्ञापन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यालयों तक पहुंचाया गया है। राजकुमार शर्मा और भाई कुंदन गुप्ता जैसे नेताओं के नेतृत्व में इस (Internal Party Rebellion) ने नेतृत्व के सामने एक नई चुनौती पेश कर दी है। ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि प्रदेश स्तर पर कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है और हार की जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के नेताओं पर डालना न्यायसंगत नहीं है।
संगठनात्मक गतिविधियों और सदस्यता अभियान पर जोर
इन तमाम विवादों के बीच प्रदेश नेतृत्व का पूरा ध्यान वर्तमान में सदस्यता अभियान को सफल बनाने पर है। पार्टी चाहती है कि अधिक से अधिक युवाओं और समाज के हर वर्ग को कांग्रेस के साथ जोड़ा जाए। (Community Engagement Programs) के जरिए पार्टी अपनी पुरानी छवि को सुधारने की कोशिश कर रही है। हालांकि, दिल्ली और पटना के बीच चल रही यह खींचतान पार्टी के कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है, जिसे सुलझाना राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए प्राथमिकता बन गया है।
बिहार कांग्रेस के भविष्य की धुंधली तस्वीर
9 जनवरी के बाद आने वाली रिपोर्ट यह तय करेगी कि बिहार कांग्रेस का भविष्य किस दिशा में जाएगा। क्या बड़े पैमाने पर जिलाध्यक्षों को हटाकर पार्टी नई ऊर्जा का संचार कर पाएगी या फिर गुटबाजी और गहरा जाएगी? (Future Electoral Prospects) को ध्यान में रखते हुए यह बदलाव पार्टी के अस्तित्व के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। फिलहाल, सबकी निगाहें दिल्ली से आने वाले किसी बड़े फैसले और पटना में तैयार होने वाली ‘कमजोर नेताओं’ की लिस्ट पर टिकी हैं।