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Manipur Illegal Ring Road Case: मणिपुर के जंगलों में सरकार की नाक के नीचे कैसे बन गई 6 जिलों की अवैध रिंग रोड…

Manipur Illegal Ring Road Case: मणिपुर से एक ऐसी चौंकाने वाली खबर सामने आई है जिसने सुरक्षा एजेंसियों और राज्य सरकार के होश उड़ा दिए हैं। राज्य के छह अलग-अलग जिलों से होकर गुजरने वाली एक विशाल ‘रिंग रोड’ का पता चला है, जिसका निर्माण (Secret Infrastructure Projects) कथित तौर पर बिना किसी सरकारी अनुमति या कागजी कार्रवाई के गुपचुप तरीके से किया जा रहा था। यह मामला न केवल अवैध निर्माण से जुड़ा है, बल्कि सीमावर्ती राज्य की सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े करता है। घने जंगलों के बीच बिछाई जा रही यह सड़क अचानक तब चर्चा में आई जब इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने लगीं।

Manipur Illegal Ring Road Case
Manipur Illegal Ring Road Case

कुकी उग्रवादियों के नाम पर ‘जर्मन’ और ‘टाइगर’ रोड

इस अवैध सड़क परियोजना की सबसे हैरान करने वाली बात इसके नामकरण को लेकर है। स्थानीय स्तर पर इस सड़क के कुछ हिस्सों को ‘जर्मन रोड’ या ‘टाइगर रोड’ के नाम से पुकारा जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ये नाम (Kuki Insurgent Groups) के शीर्ष कमांडरों के उपनामों पर आधारित हैं, जो क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादी समूहों के प्रभाव को दर्शाते हैं। एक ऐसी सड़क जिसका वजूद सरकारी फाइलों में कहीं नहीं है, उसका इस तरह उग्रवादियों के नाम पर रखा जाना राज्य के भीतर समानांतर सत्ता चलाने की कोशिशों की ओर इशारा करता है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का कड़ा प्रहार और रोक

जैसे ही यह मामला कानूनी गलियारों तक पहुंचा, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने इस पर तत्काल संज्ञान लिया। एनजीटी ने 23 दिसंबर को एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए (Environmental Law Enforcement) के तहत इस पूरी रिंग रोड परियोजना पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी है। ट्रिब्यूनल ने मणिपुर सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं कि इस सड़क पर किसी भी तरह का निर्माण कार्य आगे न बढ़ने दिया जाए। यह आदेश मणिपुर की पारिस्थितिकी और सुरक्षा दोनों ही लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मुख्य सचिव और जिला प्रशासन को सख्त हिदायत

एनजीटी ने केवल काम रोकने का आदेश ही नहीं दिया, बल्कि जवाबदेही भी तय की है। मणिपुर के मुख्य सचिव को निर्देश दिया गया है कि वे प्रभावित छह जिलों के जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को (Administrative Accountability) सुनिश्चित करने के लिए व्यक्तिगत रूप से आदेश दें। यह सुनिश्चित करना अब प्रशासन की जिम्मेदारी है कि जंगल की जमीन पर दोबारा कोई बुलडोजर या मजदूर नजर न आए। इस आदेश के बाद अब जिला प्रशासन उन रास्तों की निगरानी कर रहा है जहां से यह अवैध रिंग रोड गुजर रही है।

सरकारी रिंग रोड और इस अवैध प्रोजेक्ट में अंतर

भ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह अवैध सड़क राजधानी इम्फाल में बन रही आधिकारिक रिंग रोड से पूरी तरह अलग है। इम्फाल की रिंग रोड परियोजना को (Asian Development Bank Funding) के माध्यम से राज्य सरकार की पूर्ण मान्यता प्राप्त है और वह नियमानुसार बनाई जा रही है। इसके विपरीत, जंगलों से गुजरने वाली यह टाइगर रोड पूरी तरह से अवैध है, जिसमें न तो कोई टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई और न ही किसी विभाग से एनओसी ली गई है।

मैतेई संगठन COCOMI की याचिका से हुआ पर्दाफाश

इस पूरे घोटाले का खुलासा कोलकाता स्थित एनजीटी कार्यालय में दायर एक याचिका के जरिए हुआ। यह याचिका मणिपुर के मैतेई समुदाय के प्रमुख नागरिक संगठन (Civil Society Organizations) ‘सीओसीओएमआई’ द्वारा दायर की गई थी। याचिका में दलील दी गई कि घने वन क्षेत्रों में बिना किसी पर्यावरणीय सुरक्षा आंकलन या भू-वैज्ञानिक जांच के इतनी बड़ी सड़क का निर्माण करना प्रकृति के साथ खिलवाड़ है। संगठन ने मांग की थी कि नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले लोगों और इसके पीछे मास्टरमाइंड के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

उग्रवाद और तस्करी के सुरक्षित गलियारे का आरोप

याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत के सामने बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि चुराचांदपुर, कांगपोकपी, नोनी और उखरूल जिलों के पहाड़ों को काटकर बनाई जा रही इस सड़क का मुख्य उद्देश्य (Illegal Drug Trafficking) और हथियारों की तस्करी के लिए एक सुरक्षित रास्ता तैयार करना है। आरोप है कि इस गुप्त मार्ग का उपयोग अवैध प्रवासियों को राज्य में प्रवेश कराने और नशीले पदार्थों की खेप को बिना किसी सुरक्षा जांच के एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए किया जा रहा था।

सोशल मीडिया पर वायरल हुई उद्घाटन की तस्वीरें

इस अवैध निर्माण की पुख्ता जानकारी तब मिली जब सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें और वीडियो सामने आए। इन तस्वीरों में साइकुल क्षेत्र के एक विधायक की मौजूदगी में इस तथाकथित (Controversial Road Inauguration) के दृश्य दिखाई दे रहे थे। टाइगर रोड के नाम से बने बड़े-बड़े गेट और फीता काटने की रस्मों ने यह साफ कर दिया कि यह काम चोरी-छिपे नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर स्थानीय रसूख के दम पर किया जा रहा था। इन सबूतों ने अदालत में याचिकाकर्ता के पक्ष को और अधिक मजबूती प्रदान की।

स्थानीय निवासियों का आक्रोश और कानून की चिंता

मणिपुर के आम नागरिकों में इस घटना को लेकर भारी गुस्सा है। एक स्थानीय निवासी ने अपनी पहचान गुप्त रखते हुए बताया कि केवल मणिपुर में ही ऐसा संभव है कि उग्रवादियों के नाम पर (Unauthorised Infrastructure Development) खुलेआम किया जाए और प्रशासन सोता रहे। लोगों का मानना है कि जो लोग कानून की परवाह नहीं करते और उग्रवादियों के साथ मिलकर समानांतर व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी हिमाकत दोबारा न हो सके।

मणिपुर संकट के दौरान शुरू हुआ निर्माण कार्य

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस सड़क का निर्माण कार्य मुख्य रूप से मणिपुर में जारी जातीय संकट और अस्थिरता के दौर में शुरू किया गया था। जब पूरा राज्य हिंसा की आग में झुलस रहा था, तब कुछ असामाजिक तत्वों ने (Insurgency Operational Routes) को मजबूत करने के लिए इस अवसर का लाभ उठाया। पहाड़ियों को काटकर बनाई गई यह सड़क रणनीतिक रूप से उग्रवादियों के लिए एक बड़ा वरदान साबित हो सकती थी, जिसे अब एनजीटी के दखल के बाद समय रहते रोकने की कोशिश की जा रही है।

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