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India Bangladesh Diplomatic Tension: रक्षक का हाथ काटने की तैयारी! बांग्लादेशी कट्टरपंथियों के अल्टीमेटम ने बढ़ाई भारत की चिंता…

India Bangladesh Diplomatic Tension: पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में इन दिनों राजनीतिक अस्थिरता के साथ-साथ कट्टरपंथ की लहरें भी तेज हो गई हैं। हाल ही में कट्टरपंथी छात्र संगठन ‘इंकलाब मंच’ ने अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस को सीधे तौर पर चार सूत्री अल्टीमेटम थमा दिया है। इस संगठन ने अपने प्रवक्ता शरीफ उस्मान बिन हादी की हत्या के बहाने भारत के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया है। संगठन की सबसे विवादास्पद मांग (anti India sentiment in Bangladesh) को हवा देते हुए वहां काम कर रहे सभी भारतीय नागरिकों के वर्क परमिट को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की है। यह मांग न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि दोनों देशों के सदियों पुराने संबंधों के लिए भी एक बड़ा खतरा बनकर उभरी है।

India Bangladesh Diplomatic Tension
India Bangladesh Diplomatic Tension

पूर्व राजनयिक की दो टूक: जो हाथ खिलाता है उसे ही काट रहा पड़ोसी

इंकलाब मंच की इस मूर्खतापूर्ण मांग पर भारत के अनुभवी और पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुनायत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बांग्लादेशी संगठनों की इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए इसे आत्मघाती कदम बताया है। त्रिगुनायत का कहना है कि (economic impact on Bangladesh) को समझे बिना ऐसी बयानबाजी करना उस हाथ को काटने जैसा है जो आपको भोजन देता है। उन्होंने साफ किया कि बांग्लादेश में भारतीय नागरिक मजदूर के रूप में नहीं, बल्कि निवेशक और विशेषज्ञों के तौर पर काम कर रहे हैं। यदि इन लोगों को वहां से हटाया गया, तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का ढांचा, जो मुख्य रूप से टेक्सटाइल उद्योग पर टिका है, पूरी तरह चरमरा जाएगा।

भारतीय निवेशकों पर टिकी है बांग्लादेशी टेक्सटाइल मिलों की सांसे

अनिल त्रिगुनायत ने बांग्लादेश की असलियत दुनिया के सामने रखते हुए बताया कि वहां काम करने वाले भारतीय मूल के लोग असल में रोजगार देने वाले हैं। ये भारतीय विशेषज्ञ (Indian investors in Bangladesh) के रूप में वहां की टेक्सटाइल मिलों को कच्चा माल और तकनीकी सहायता प्रदान करते हैं। बांग्लादेश का गारमेंट सेक्टर वैश्विक बाजार में अपनी पहचान इन्हीं भारतीयों के सहयोग से बनाए हुए है। अगर यूनुस सरकार कट्टरपंथियों के दबाव में आकर वर्क परमिट निलंबित करने जैसा कोई भी कदम उठाती है, तो इसका सबसे भारी नुकसान बांग्लादेश को ही उठाना पड़ेगा। भारत के लिए बांग्लादेश महज एक बाजार है, लेकिन बांग्लादेश के लिए भारत उसकी जीवन रेखा है।

शरीफ उस्मान हादी की मौत और हिंसा का नया चक्र

इंकलाब मंच के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद ढाका की सड़कों पर जो प्रदर्शन हुए, उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। हादी की मौत को आधार बनाकर (political instability in Dhaka) को और हवा दी जा रही है। जुलाई विद्रोह के दौरान प्रमुख चेहरा रहे हादी की सिंगापुर में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। अब उनकी मौत का जिम्मा भारत पर मढ़ने की कोशिश की जा रही है और कट्टरपंथी मांग कर रहे हैं कि यदि संदिग्धों को भारत नहीं सौंपता, तो अंतरराष्ट्रीय अदालत में मुकदमा चलाया जाए। इस बेबुनियाद आरोपों ने ढाका में मीडिया घरानों और सांस्कृतिक केंद्रों पर हमलों की झड़ी लगा दी है, जिसकी पूरी दुनिया में निंदा हो रही है।

उच्चायुक्त की वापसी और कूटनीतिक गलियारों में मची हलचल

दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव का सबसे बड़ा प्रमाण तब मिला जब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने भारत में अपने उच्चायुक्त एम रियाज हमीदुल्लाह को अचानक ढाका वापस बुला लिया। कूटनीतिक भाषा में (diplomatic recall of high commissioner) को एक गंभीर संकेत माना जाता है। हालांकि, भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक सामान्य प्रक्रिया भी हो सकती है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इसे सामान्य कहना मुश्किल है। अनिल त्रिगुनायत के अनुसार, बांग्लादेश अपनी आंतरिक विफलताओं को छिपाने के लिए भारत को एक ‘पंचिंग बैग’ की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जो कि अत्यंत निंदनीय है।

अल्पसंख्यकों पर हमले और भारत की कड़ी आपत्ति

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में कड़वाहट का एक बड़ा कारण वहां रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं पर बढ़ते हमले भी हैं। शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से ही (attacks on minorities in Bangladesh) की घटनाओं में भारी इजाफा हुआ है। मंदिरों को निशाना बनाया जा रहा है और प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटा जा रहा है। भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन हमलों की कड़ी निंदा की है और यूनुस सरकार से हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। भारत की यह स्पष्ट मांग कट्टरपंथी संगठनों को रास नहीं आ रही है, जिसके कारण वे लगातार भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा चला रहे हैं।

इंकलाब मंच की चार सूत्री मांगें: तर्क या उन्माद?

रविवार को जब इंकलाब मंच के सदस्य सचिव अब्दुल्लाह अल जाबेर ने अपनी मांगें रखीं, तो उसमें न्याय से ज्यादा नफरत की गंध आ रही थी। 24 दिनों के भीतर हादी की हत्या का मुकदमा पूरा करना और (Indian work permit suspension) की मांग करना किसी भी संप्रभु देश की न्याय प्रणाली के लिए एक मजाक जैसा है। वे न केवल भारतीयों को बाहर निकालने की बात कर रहे हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अदालत में मुकदमा चलाने की धमकी भी दे रहे हैं। ये मांगें यह दर्शाती हैं कि संगठन का मकसद न्याय पाना नहीं, बल्कि बांग्लादेश की जनता के मन में भारत के प्रति घृणा पैदा करना है।

निष्कर्ष: अपनी आंतरिक समस्याओं से निपटना होगा बांग्लादेश को

अंत में, यह स्पष्ट है कि बांग्लादेश इस समय एक चौराहे पर खड़ा है। उसे यह तय करना होगा कि वह कट्टरपंथियों के इशारे पर अपनी अर्थव्यवस्था को तबाह करेगा या भारत जैसे पड़ोसी देश के साथ मिलकर विकास की राह पर चलेगा। जैसा कि (Indo Bangladesh cross border ties) के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है, भारत को दोष देने से बांग्लादेश की समस्याएं कम नहीं होंगी। यूनुस सरकार को चाहिए कि वह अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और कट्टरपंथी संगठनों पर नकेल कसे। भारत हमेशा एक जिम्मेदार पड़ोसी की भूमिका निभाता आया है, लेकिन अपनी गरिमा और नागरिकों के हितों से समझौता करना उसे भी स्वीकार्य नहीं होगा।

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