MonsoonDeficit – बिहार में लगातार छठे साल जुलाई में सामान्य से कम रही बारिश
MonsoonDeficit– बिहार में इस वर्ष भी जुलाई का महीना सामान्य से कम बारिश के साथ समाप्त हुआ। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में राज्य के लिए सामान्य वर्षा का मानक 340.5 मिमी है, जबकि इस बार केवल 203 मिमी वर्षा दर्ज की गई। इसके साथ ही लगातार छठे वर्ष जुलाई में मानसून अपेक्षित स्तर तक सक्रिय नहीं हो सका। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून की बदलती चाल का असर राज्य के वर्षा चक्र पर लगातार दिखाई दे रहा है।

मानसून ट्रफ की स्थिति बनी बड़ी वजह
मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक आशीष कुमार के अनुसार, हाल के वर्षों में मानसून के फैलाव में देरी और मानसून ट्रफ का लंबे समय तक बिहार के ऊपर सक्रिय नहीं रहना वर्षा में कमी का प्रमुख कारण रहा है। उन्होंने कहा कि जुलाई के दौरान सामान्य से कम बारिश का यही पैटर्न पिछले कई वर्षों से देखने को मिल रहा है। यदि मौसम की यही स्थिति बनी रहती है, तो आने वाले वर्षों में भी इसी तरह की परिस्थितियां बन सकती हैं।
केवल कुछ जिलों में सामान्य से बेहतर बारिश
विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष जुलाई में सबसे अधिक वर्षा सीवान जिले में दर्ज की गई, जहां सामान्य से 18 प्रतिशत अधिक बारिश हुई। खगड़िया में भी सामान्य से एक प्रतिशत अधिक वर्षा रिकॉर्ड की गई। इसके विपरीत सीतामढ़ी में सबसे कम बारिश हुई, जहां सामान्य से 71 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। पूरे राज्य में केवल तीन जिलों में सामान्य वर्षा रही, जबकि 33 जिलों में बारिश औसत से कम रिकॉर्ड की गई।
पटना सहित कई जिलों में वर्षा की बड़ी कमी
राजधानी पटना में जुलाई के दौरान सामान्य वर्षा 315.6 मिमी के मुकाबले केवल 187.8 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो लगभग 40 प्रतिशत कम है। इसके अलावा अररिया, अरवल, बांका, कैमूर, भागलपुर, दरभंगा, गया, भोजपुर, जहानाबाद, जमुई, मधुबनी, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, नालंदा, नवादा, रोहतास, सहरसा, समस्तीपुर, शिवहर, सुपौल और अन्य कई जिलों में भी सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई। कई जिलों में बारिश की कमी 50 प्रतिशत से अधिक रही, जिससे कृषि और जल संसाधनों पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
खेती और भूजल पर बढ़ा दबाव
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जुलाई धान की रोपाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण महीनों में से एक माना जाता है। लगातार कई वर्षों से इस महीने में कम बारिश होने के कारण किसानों को सिंचाई के लिए पंप और अन्य संसाधनों पर अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है। इससे खेती की लागत बढ़ रही है और भूजल स्तर पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। पर्याप्त वर्षा नहीं होने से धान की रोपाई की गति प्रभावित होती है, जिसका असर आगे चलकर उत्पादन पर भी पड़ सकता है।
छह वर्षों से बना हुआ है यही रुझान
आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 के बाद जुलाई में बिहार सामान्य वर्षा का स्तर हासिल नहीं कर सका है। वर्ष 2026 में 203 मिमी, 2025 में 199.5 मिमी, 2024 में 238.6 मिमी, 2023 में 174.6 मिमी, 2022 में 130.1 मिमी और 2021 में 244.6 मिमी बारिश दर्ज की गई। इन सभी वर्षों में सामान्य वर्षा की तुलना में उल्लेखनीय कमी रही। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मानसूनी पैटर्न पर लगातार निगरानी और जल संरक्षण के प्रभावी उपाय भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक होंगे।