SchoolAttendance – टैब आधारित हाजिरी व्यवस्था लागू, फिर भी कई स्कूल पीछे
SchoolAttendance – राज्य के सरकारी स्कूलों में डिजिटल उपस्थिति दर्ज करने की योजना अब भी पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर पाई है। शिक्षा विभाग की ओर से लाखों रुपये खर्च कर स्कूलों को टैबलेट उपलब्ध कराए गए, लेकिन बड़ी संख्या में स्कूलों में अब भी पारंपरिक तरीके से ही हाजिरी ली जा रही है। विभागीय निर्देशों के बावजूद अप्रैल में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के बाद भी व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो सकी है।

टैब वितरण के बावजूद लागू नहीं हो सकी व्यवस्था
राज्य के लगभग 76 हजार से अधिक स्कूलों में छात्रों और शिक्षकों की ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करने के लिए टैबलेट उपलब्ध कराए गए हैं। अब तक करीब 1.55 लाख टैब स्कूलों को भेजे जा चुके हैं। आंकड़ों के अनुसार 97 प्रतिशत से अधिक स्कूलों तक यह उपकरण पहुंच चुका है, फिर भी इसका उपयोग अपेक्षित स्तर तक नहीं हो रहा है।
शिक्षा विभाग ने फरवरी से ही टैब के माध्यम से हाजिरी अनिवार्य करने का निर्देश दिया था। हालांकि जमीनी स्तर पर स्थिति अलग दिखाई दे रही है। कुछ चुनिंदा स्कूलों को छोड़ दें तो अधिकांश जगहों पर अभी भी पुरानी पद्धति ही अपनाई जा रही है। इससे योजना के उद्देश्य पर सवाल उठने लगे हैं।
तकनीकी और व्यावहारिक दिक्कतें बनी बाधा
इस व्यवस्था के लागू न हो पाने के पीछे कई वजहें सामने आ रही हैं। सबसे प्रमुख कारण स्कूलों में वास्तविक उपस्थिति और दर्ज की जाने वाली उपस्थिति के बीच अंतर को बताया जा रहा है। कुछ स्थानों पर यह आशंका भी जताई जा रही है कि डिजिटल सिस्टम से वास्तविक आंकड़े सामने आ जाएंगे, जिससे हिचकिचाहट बनी हुई है।
इसके अलावा कई शिक्षकों को टैबलेट संचालन में तकनीकी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सभी स्कूलों में कंप्यूटर प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, जिससे समस्या और बढ़ जाती है। वर्तमान में कई शिक्षक मोबाइल फोन के जरिए फोटो भेजकर उपस्थिति दर्ज कर लेते हैं, जबकि टैब आधारित सिस्टम में स्कूल में उपस्थित रहना अनिवार्य हो जाता है।
प्रशिक्षण के बावजूद नहीं बदली स्थिति
राज्य शिक्षा परियोजना परिषद की ओर से टैबलेट के उपयोग के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण भी दिया गया था। दिसंबर और जनवरी के दौरान प्रधानाध्यापकों और प्रधान शिक्षकों के साथ-साथ प्रत्येक स्कूल में एक नोडल शिक्षक को प्रशिक्षित किया गया।
नोडल शिक्षक के चयन में यह ध्यान रखा गया कि वह तकनीकी रूप से सक्षम हो, ताकि अन्य शिक्षकों को भी सहयोग मिल सके। इसके बावजूद कई स्कूलों में प्रशिक्षण का असर सीमित ही दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि नियमित निगरानी और तकनीकी सहायता भी जरूरी है।
ऑनलाइन सिस्टम से पारदर्शिता की उम्मीद
इस नई व्यवस्था में छात्रों और शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज होते ही वह सीधे ई-शिक्षा कोष पोर्टल पर अपडेट हो जाती है। इसमें फेस रिकग्निशन सिस्टम का भी उपयोग किया जा रहा है, जिससे फर्जी उपस्थिति की संभावना कम हो जाती है।
कक्षा शिक्षक को छात्रों का सामूहिक फोटो अपलोड करना होता है, जबकि प्रत्येक शिक्षक को एक यूनिक कोड दिया गया है। इस सिस्टम का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाना है। हालांकि जब तक सभी स्कूलों में इसका सही तरीके से उपयोग नहीं होगा, तब तक इसका पूरा लाभ मिलना मुश्किल रहेगा।
निगरानी और सख्ती की जरूरत
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना को सफल बनाने के लिए विभाग को सख्ती के साथ निगरानी करनी होगी। साथ ही जिन स्कूलों में तकनीकी समस्या है, वहां तत्काल समाधान उपलब्ध कराना जरूरी है।
यदि इस व्यवस्था को पूरी तरह लागू किया जाता है, तो इससे न केवल उपस्थिति में सुधार होगा बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। फिलहाल यह योजना अपने शुरुआती चरण में ही चुनौतियों से जूझती नजर आ रही है।