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Crude Oil – वैश्विक बाजार में नरम पड़े तेल के दाम, भारत को दिखे राहत के संकेत

Crude Oil – अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में पिछले कुछ दिनों से लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। कच्चे तेल की कीमतें कई महीनों के निचले स्तर पर पहुंच गई हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई हलचल पैदा हो गई है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की उम्मीदों ने निवेशकों का रुख बदल दिया है, जिसका सीधा असर तेल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है।

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समझौते की उम्मीद से बढ़ी आपूर्ति की संभावना

बाजार में यह चर्चा तेज है कि अमेरिका और ईरान के बीच जल्द एक अंतरिम समझौता हो सकता है। यदि यह समझौता आगे बढ़ता है तो ईरान को वैश्विक बाजार में तेल निर्यात बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। निवेशकों को उम्मीद है कि अतिरिक्त आपूर्ति आने से वैश्विक स्तर पर तेल की उपलब्धता सुधरेगी और कीमतों पर दबाव बना रहेगा। इसी संभावना के चलते हाल के कारोबारी सत्रों में तेल के दाम लगातार कमजोर हुए हैं।

प्रमुख बेंचमार्क में दर्ज हुई गिरावट

अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमत 77 डॉलर प्रति बैरल से नीचे पहुंच गई है। लगातार चार कारोबारी सत्रों में इसमें उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई, जिसे इस वर्ष की सबसे लंबी गिरावटों में से एक माना जा रहा है। वहीं ब्रेंट क्रूड भी 79 डॉलर प्रति बैरल के नीचे बंद हुआ। दोनों प्रमुख बेंचमार्क में आई कमजोरी से संकेत मिल रहे हैं कि बाजार भविष्य की संभावित आपूर्ति को पहले से ही कीमतों में शामिल कर रहा है।

होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी बाजार की नजर

ऊर्जा बाजार के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य का विशेष महत्व है क्योंकि दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में आवाजाही सामान्य होती है और भू-राजनीतिक तनाव कम होता है तो तेल आपूर्ति संबंधी चिंताएं काफी हद तक घट सकती हैं। इससे वैश्विक बाजार में स्थिरता आने की संभावना बढ़ेगी।

सामान्य स्थिति बहाल होने में लग सकता है समय

हालांकि संभावित समझौते को सकारात्मक माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री परिवहन और तेल आपूर्ति पूरी तरह सामान्य होने में कुछ समय लग सकता है। शुरुआती दौर में सुरक्षा व्यवस्थाओं को मजबूत रखना आवश्यक होगा। कई विश्लेषकों का अनुमान है कि आने वाले कुछ सप्ताह तक तेल टैंकरों की आवाजाही सामान्य स्तर से कम रह सकती है। ऐसे में बाजार राहत की उम्मीद तो कर रहा है, लेकिन पूरी तरह आश्वस्त नहीं है।

घटते अमेरिकी भंडार ने बढ़ाई दिलचस्पी

एक ओर तेल की कीमतों में गिरावट आ रही है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के कच्चे तेल भंडार में कमी दर्ज की गई है। उद्योग से जुड़े ताजा आंकड़ों के अनुसार पिछले सप्ताह अमेरिकी भंडार में लगभग 83 लाख बैरल की गिरावट हुई है। ओक्लाहोमा स्थित कुशिंग हब में भी स्टॉक कम होने की जानकारी सामने आई है। यह स्थिति दर्शाती है कि मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन को लेकर बाजार अभी भी संवेदनशील बना हुआ है।

भारत को मिल सकता है आर्थिक लाभ

कच्चे तेल की कीमतों में नरमी भारत के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने से आयात लागत कम हो सकती है। इसका असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है। साथ ही सरकार के आयात बिल में कमी आने और चालू खाते पर दबाव घटने की संभावना भी जताई जा रही है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक नियंत्रित रहती हैं तो इससे महंगाई पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

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