Energy Policy – रूस और ईरान ने दिए तेल पर छूट खत्म करने के संकेत
Energy Policy – अमेरिका ने रूस और ईरान से जुड़े तेल कारोबार को लेकर अपने रुख को और सख्त करने के संकेत दिए हैं। हाल ही में दी गई अस्थायी छूट की अवधि बढ़ाने की संभावना को खारिज करते हुए अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने साफ कहा है कि अब आगे किसी विस्तार की योजना नहीं है। यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही अस्थिरता का सामना कर रहे हैं।

छूट बढ़ाने पर स्पष्ट इनकार
अमेरिकी वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि समुद्र में मौजूद रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद के लिए दी गई छूट अब आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। इसी तरह ईरान से जुड़े तेल पर दी गई एक बार की राहत को भी आगे जारी रखने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका अपने रुख में ढील देने के पक्ष में नहीं है और इस दिशा में सख्ती जारी रहेगी।
ईरान पर दबाव की रणनीति
बेसेंट के बयान से यह भी संकेत मिलता है कि ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की नीति जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में ईरान के तेल उत्पादन और निर्यात पर असर पड़ सकता है। उनके अनुसार, आने वाले दिनों में उत्पादन पर भी असर देखने को मिल सकता है, जिससे वहां के तेल उद्योग को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बनी हुई है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति पर नजर रखी जा रही है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए एक अहम मार्ग है। यदि यहां कोई बाधा आती है, तो इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।
पहले क्यों दी गई थी छूट
मार्च में अमेरिका ने वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को संतुलित रखने के उद्देश्य से अस्थायी छूट दी थी। उस समय कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थीं, जिससे कई देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ने लगा था। इस स्थिति को देखते हुए कुछ समय के लिए नियमों में ढील दी गई थी।
गरीब देशों की चिंता भी बनी वजह
अमेरिकी वित्त मंत्री ने यह भी बताया कि हाल ही में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की बैठकों के दौरान कई गरीब और कमजोर देशों ने मदद की अपील की थी। इन देशों की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पहले छूट को सीमित अवधि के लिए बढ़ाया गया था। हालांकि अब अमेरिका इस नीति को आगे जारी रखने के पक्ष में नहीं दिख रहा है।
आगे क्या संकेत मिलते हैं
ताजा बयान से यह साफ होता है कि अमेरिका अब ऊर्जा बाजार में हस्तक्षेप को सीमित करते हुए अपने प्रतिबंधों को कड़ाई से लागू करना चाहता है। इससे आने वाले समय में तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।