Home Loan – जरूरी है पति-पत्नी की अलग टैक्स रिजीम में होम लोन छूट के नियम समझना…
Home Loan – यदि पति-पत्नी ने संयुक्त रूप से होम लोन लिया है और अब तक दोनों टैक्स छूट का लाभ लेते रहे हैं, तो वित्त वर्ष 2025-26 (असेसमेंट ईयर 2026-27) में अलग-अलग टैक्स रिजीम चुनने की स्थिति में नियमों को समझना आवश्यक हो जाता है। आयकर कानून के अनुसार पति और पत्नी दोनों स्वतंत्र करदाता माने जाते हैं। ऐसे में दोनों अपनी वित्तीय स्थिति के आधार पर पुरानी या नई टैक्स रिजीम में से किसी एक का चयन कर सकते हैं। हालांकि, होम लोन पर मिलने वाली टैक्स राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित व्यक्ति ने कौन-सी टैक्स व्यवस्था अपनाई है।

पुरानी टैक्स व्यवस्था में उपलब्ध हैं प्रमुख लाभ
यदि पति या पत्नी में से कोई पुरानी टैक्स रिजीम का विकल्प चुनता है और वह संपत्ति का सह-स्वामी होने के साथ-साथ होम लोन का सह-उधारकर्ता भी है तथा अपनी हिस्सेदारी की ईएमआई का भुगतान करता है, तो वह होम लोन पर मिलने वाली टैक्स छूट का दावा कर सकता है। मौजूदा प्रावधानों के अनुसार मूलधन के भुगतान पर आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत अधिकतम 1.5 लाख रुपये तक की कटौती उपलब्ध है। वहीं, स्वयं के उपयोग वाले मकान पर दिए गए ब्याज के लिए धारा 24(b) के तहत अधिकतम 2 लाख रुपये तक की टैक्स राहत मिल सकती है।
किन परिस्थितियों में दोनों को मिलेगा लाभ
अगर पति और पत्नी दोनों पुरानी टैक्स रिजीम अपनाते हैं और सभी आवश्यक शर्तों का पालन करते हैं, तो दोनों अलग-अलग अपने हिस्से के अनुसार टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं। इस स्थिति में संयुक्त रूप से मूलधन पर 3 लाख रुपये तक और ब्याज पर 4 लाख रुपये तक की कुल टैक्स राहत का लाभ मिल सकता है। हालांकि, केवल लोन में सह-आवेदक होना पर्याप्त नहीं है। टैक्स लाभ प्राप्त करने के लिए दोनों का संपत्ति में सह-स्वामित्व होना, होम लोन में सह-उधारकर्ता होना और ईएमआई भुगतान में वास्तविक हिस्सेदारी निभाना अनिवार्य है।
नई टैक्स रिजीम में सीमित हैं होम लोन के फायदे
यदि पति या पत्नी में से कोई नई टैक्स रिजीम चुनता है और मकान स्वयं के रहने के लिए उपयोग में है, तो उसे होम लोन के मूलधन या ब्याज पर किसी प्रकार की टैक्स छूट नहीं मिलेगी। हालांकि, यदि संबंधित संपत्ति किराये पर दी गई है, तो ब्याज की राशि को किराये से होने वाली आय की गणना में शामिल किया जा सकता है। इसके बावजूद इस प्रक्रिया से होने वाले नुकसान को वेतन या अन्य आय के साथ समायोजित करने की अनुमति नहीं होती, जिससे नई टैक्स व्यवस्था में होम लोन से मिलने वाला कर लाभ काफी सीमित हो जाता है।
किराये की संपत्ति के लिए अलग प्रावधान
पुरानी टैक्स रिजीम में किराये पर दी गई संपत्ति के मामले में पति-पत्नी अपने-अपने स्वामित्व और भुगतान के अनुपात में ब्याज पर कटौती का दावा कर सकते हैं। हालांकि, एक वित्त वर्ष के दौरान हाउस प्रॉपर्टी से होने वाले नुकसान में से अधिकतम 2 लाख रुपये तक ही अन्य आय के साथ समायोजित किए जा सकते हैं। यदि इससे अधिक नुकसान होता है, तो निर्धारित नियमों के तहत उसे अगले आठ वित्त वर्षों तक आगे ले जाकर समायोजित किया जा सकता है।
टैक्स रिजीम चुनने से पहले करें वित्तीय आकलन
कर विशेषज्ञों का मानना है कि पति-पत्नी के लिए एक जैसी टैक्स रिजीम चुनना अनिवार्य नहीं है। दोनों अपनी आय, निवेश, होम लोन की स्थिति और उपलब्ध टैक्स लाभ का अलग-अलग मूल्यांकन करके उपयुक्त टैक्स व्यवस्था का चयन कर सकते हैं। सही विकल्प चुनने से कर बचत के साथ-साथ दीर्घकालिक वित्तीय योजना को भी बेहतर बनाया जा सकता है।