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RajeshKhanna – जब पहली फिल्म के लिए तीन दिन तक नहीं सो पाए थे अभिनेता…

RajeshKhanna – हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार माने जाने वाले राजेश खन्ना ने अपने करियर में कई यादगार फिल्में दीं, लेकिन उनकी पहली फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा आज भी फिल्म प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। बहुत कम लोग जानते हैं कि अपने शुरुआती अभिनय सफर में एक किरदार को वास्तविकता के करीब दिखाने के लिए उन्हें लगातार तीन दिनों तक पूरी नींद नहीं लेने दी गई थी।

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फिल्म ‘आखिरी खत’ की शूटिंग के दौरान निर्देशक चेतन आनंद ने एक खास तरीका अपनाया था, जिससे पर्दे पर किरदार की मानसिक और शारीरिक स्थिति स्वाभाविक रूप से दिखाई दे सके। इसी प्रयोग ने बाद में फिल्म की विश्वसनीयता को और मजबूत बनाया।

किरदार में असली थकान दिखाने की कोशिश

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, फिल्म में राजेश खन्ना का किरदार भावनात्मक तनाव और बेचैनी से गुजरता है। निर्देशक चाहते थे कि यह थकान केवल अभिनय तक सीमित न रहे, बल्कि अभिनेता के चेहरे पर वास्तविक रूप में नजर आए।

इसी वजह से चेतन आनंद रात के अलग-अलग समय पर राजेश खन्ना को फोन कर जगा देते थे। लगातार कई दिनों तक उनकी नींद बाधित की गई, ताकि शूटिंग के दौरान चेहरे पर स्वाभाविक थकावट दिखाई दे। जब अभिनेता सेट पर पहुंचे तो उनके चेहरे पर वही भाव और थकान नजर आई, जिसकी कहानी को जरूरत थी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मिली पहचान

‘आखिरी खत’ केवल राजेश खन्ना के करियर की शुरुआत भर नहीं थी, बल्कि भारतीय सिनेमा के लिए भी एक महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई। वर्ष 1968 में इस फिल्म को अकादमी अवॉर्ड्स की सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी के लिए भारत की ओर से भेजा गया था।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर फिल्म को ‘The Last Letter’ नाम से प्रस्तुत किया गया था। उस दौर में किसी भारतीय फिल्म का इस तरह वैश्विक स्तर पर पहुंचना बड़ी उपलब्धि माना जाता था।

दो कलाकारों का यादगार सफर

इस फिल्म के जरिए राजेश खन्ना के साथ मास्टर बंटी बहल को भी दर्शकों के सामने पेश किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि दोनों कलाकार लगभग दो दशक बाद फिर एक फिल्म में साथ नजर आए।

फिल्म ‘अमृत’ में राजेश खन्ना और बंटी बहल ने दादा और पोते की भूमिका निभाई थी। इस तरह दोनों कलाकारों का सफर एक अनोखे सिनेमाई संबंध का उदाहरण बन गया।

भावनाओं से भरी थी कहानी

‘आखिरी खत’ की कहानी गोविंद और लज्जो नाम के दो किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और विवाह कर लेते हैं। बाद में गोविंद रोज़गार की तलाश में शहर चला जाता है और अपनी पत्नी को साथ ले जाने का वादा करता है।

हालात बदलते हैं और लज्जो एक बेटे को जन्म देती है। जीवन के अंतिम क्षणों में वह अपने पति के नाम एक पत्र लिखती है, जिसमें बेटे की जिम्मेदारी संभालने की बात कही जाती है। यहीं से कहानी एक भावनात्मक मोड़ लेती है और बच्चे की तलाश की यात्रा शुरू होती है।

बच्चे के साथ शूटिंग बनी चुनौती

फिल्म का एक बड़ा हिस्सा एक छोटे बच्चे के इर्द-गिर्द केंद्रित था, जो मुंबई की भीड़भाड़ में खो जाता है। उस समय इतनी कम उम्र के बच्चे के साथ शूटिंग करना आसान नहीं था।

साल 2007 में चेतन आनंद के बेटे केतन आनंद ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उनके पिता ने करीब 15 महीने के बच्चे के साथ कई जटिल दृश्य फिल्माए थे। कैमरा टीम बच्चे की गतिविधियों को लगातार रिकॉर्ड करती थी, जिससे कहानी को यथार्थ के करीब रखा जा सके। यही वजह है कि ‘आखिरी खत’ को आज भी भारतीय सिनेमा की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है।

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