स्वास्थ्य

Childhood Diabetes Prevention: क्या आपके बच्चे की गर्दन पर भी है यह गहरा निशान, माता-पिता की एक छोटी सी अनदेखी पड़ सकती है जीवन भर भारी

Childhood Diabetes Prevention: आज का दौर बदल चुका है, जहां पहले बीमारियां केवल बुजुर्गों या ढलती उम्र के लोगों को अपना शिकार बनाती थीं, वहीं अब छोटे बच्चे भी इसकी जद में आ रहे हैं। हृदय रोग, हाई कोलेस्ट्रॉल और बीपी जैसी समस्याएं अब 14 से 18 साल के किशोरों में घर कर रही हैं। सबसे ज्यादा डराने वाले आंकड़े (Type 2 Diabetes in kids) को लेकर सामने आ रहे हैं, जो भविष्य की एक बेहद डरावनी तस्वीर पेश करते हैं। अगर हम आज नहीं चेते, तो हमारी अगली पीढ़ी को ताउम्र दवाओं के सहारे जीना पड़ सकता है।

Childhood Diabetes Prevention
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हेल्दी दिखने वाला बच्चा भी हो सकता है बीमार

अक्सर माता-पिता को लगता है कि यदि उनका बच्चा गोल-मटोल और ‘हेल्दी’ दिख रहा है, तो वह पूरी तरह स्वस्थ है। लेकिन डायबिटीज स्पेशलिस्ट डॉक्टर प्रमोद त्रिपाठी का कहना है कि अत्यधिक वजन या मोटापा असल में (childhood obesity risks) का ही एक रूप है। कम उम्र में होने वाली यह डायबिटीज किसी बड़े खतरे की घंटी से कम नहीं है। हमें यह समझना होगा कि बाहरी चमक-दमक के बजाय शरीर की आंतरिक कार्यप्रणाली कैसी है, क्योंकि यही बच्चे के भविष्य का आधार है।

गर्दन का काला निशान: खतरे का पहला संकेत

डॉक्टर प्रमोद के मुताबिक, बच्चों में इंसुलिन रेजिस्टेंस को पहचानने का सबसे आसान तरीका उनकी त्वचा में होने वाले बदलाव हैं। यदि बच्चे की गर्दन पर काला निशान या गहरे रंग की लाइन बन रही है और यह समय के साथ बढ़ती जा रही है, तो यह (Acanthosis Nigricans symptoms) का संकेत हो सकता है। यह शरीर में बढ़ते इंसुलिन के स्तर को दर्शाता है। ऐसी स्थिति में केवल शुगर टेस्ट काफी नहीं है, बल्कि बच्चे का प्रॉपर इंसुलिन टेस्ट करवाना अनिवार्य हो जाता है।

इंसुलिन की रीडिंग और उसके छिपे हुए अर्थ

इंसुलिन टेस्ट की रिपोर्ट को समझना हर अभिभावक के लिए जरूरी है। डॉक्टर बताते हैं कि यदि इंसुलिन का स्तर 6 के भीतर है, तो स्थिति सामान्य है। लेकिन यदि यह 6 से 10 के बीच आता है, तो यह (mild insulin resistance) की श्रेणी में आता है, जो चिंता का विषय है। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब यह आंकड़ा 10 के पार चला जाता है। इसका मतलब है कि शरीर को शुगर पचाने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है और अब सतर्क होने का समय आ चुका है।

‘SPC’ रूल: सेहत सुधारने का जादुई मंत्र

यदि आपके बच्चे की रिपोर्ट में इंसुलिन रेजिस्टेंस अधिक आया है, तो घबराने के बजाय जीवनशैली में बदलाव करने की जरूरत है। डॉक्टर प्रमोद ने इसके लिए ‘SPC’ का एक विशेष नियम सुझाया है। यह (lifestyle modification for health) का एक ऐसा ढांचा है, जो न केवल शुगर लेवल को नियंत्रित करता है, बल्कि बच्चे के सर्वांगीण विकास में भी मदद करता है। आइए जानते हैं कि यह नियम कैसे काम करता है और इसे घर में कैसे लागू किया जा सकता है।

‘S’ यानी स्लीप टाइम: नींद से समझौता पड़ेगा भारी

एस (S) का अर्थ है स्लीप टाइम यानी सोने का समय। आजकल देर रात तक जागने और मोबाइल देखने की आदत ने बच्चों की नींद का चक्र बिगाड़ दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि (sleep deprivation effects) सीधे तौर पर मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देते हैं। रात 9 बजे तक स्क्रीन टाइम बंद कर देना चाहिए और 10:30 बजे तक बच्चे को गहरी नींद में होना चाहिए। नींद के साथ खिलवाड़ करना असल में एक लंबी चलने वाली बीमारी को न्योता देना है।

‘P’ यानी प्ले टाइम: पसीना बहाना है जरूरी

पी (P) का मतलब है प्ले टाइम। आज के डिजिटल युग में बच्चे मैदानों से दूर होकर स्मार्टफोन में सिमट गए हैं। शारीरिक सक्रियता की कमी (physical inactivity consequences) के रूप में सामने आ रही है। बच्चे के लिए हर दिन कम से कम 1 घंटा फुटबॉल, क्रिकेट या दौड़-भाग वाला खेल खेलना अनिवार्य होना चाहिए। जब बच्चा मैदान पर पसीना बहाता है, तो उसका शरीर इंसुलिन का बेहतर उपयोग कर पाता है और डायबिटीज का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।

‘C’ यानी चीट टाइम: हर जिद पूरी करना प्यार नहीं

अंत में सी (C) का अर्थ है चीट टाइम। जंक फूड जैसे पिज्जा, बर्गर और मैगी आजकल बच्चों की पहली पसंद बन गए हैं। लेकिन (unhealthy eating habits) ही वह मुख्य वजह है जो ब्लड शुगर को अचानक बढ़ा देती है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चे को हफ्ते में केवल एक दिन ही उसकी पसंद का बाहरी खाना दें। रोजाना बाहर का खाना खिलाना या उसकी हर जिद पूरी करना उसके स्वास्थ्य के साथ बड़ा खिलवाड़ है, जिसका खामियाजा उसे आगे चलकर भुगतना पड़ेगा।

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