FattyLiver – बढ़ते मामलों के बीच डॉक्टर ने बताए सुधार के तीन अहम तरीके
FattyLiver – पिछले कुछ वर्षों में फैटी लिवर की समस्या तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य चिंताओं में शामिल हो गई है। बदलती जीवनशैली, असंतुलित खानपान और शारीरिक गतिविधि की कमी को इसकी प्रमुख वजहों में माना जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति तब पैदा होती है जब लिवर में सामान्य से अधिक मात्रा में वसा जमा होने लगती है। इस स्थिति को नॉन एल्कोहलिक फैटी लिवर के रूप में भी जाना जाता है। हालांकि शुरुआती चरण में इसके लक्षण अक्सर स्पष्ट नहीं होते, इसलिए कई लोग लंबे समय तक इस समस्या से अनजान रहते हैं। चिकित्सकों का कहना है कि समय रहते खानपान और जीवनशैली में बदलाव किए जाएं तो इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

भारत में बड़ी संख्या में लोग प्रभावित
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत में लगभग 35 प्रतिशत से अधिक लोग किसी न किसी स्तर पर फैटी लिवर की समस्या से जूझ रहे हैं। कई मामलों में यह बीमारी बिना किसी स्पष्ट लक्षण के विकसित होती रहती है। डॉक्टर प्रमोद त्रिपाठी के अनुसार, आजकल इस स्थिति की पहचान पहले की तुलना में काफी आसान हो गई है।
उनका कहना है कि महंगे परीक्षणों पर निर्भर रहने की बजाय लिवर फंक्शन टेस्ट की रिपोर्ट भी कई संकेत दे सकती है। यदि SGPT और SGOT के अनुपात में SGPT का स्तर अधिक यानी एक से ज्यादा दिखाई देता है, तो यह लिवर में वसा जमा होने की संभावना का संकेत हो सकता है। हालांकि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी माना जाता है।
खानपान में बदलाव से मिल सकता है शुरुआती लाभ
डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक, फैटी लिवर की शुरुआती स्थिति में सबसे पहले भोजन की आदतों पर ध्यान देना जरूरी है। विशेष रूप से कार्बोहाइड्रेट की अधिक मात्रा को कम करना फायदेमंद हो सकता है। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति रोजाना दो रोटियां खाता है, तो उसे धीरे-धीरे यह मात्रा कम करके डेढ़ या एक रोटी तक लाने की कोशिश करनी चाहिए।
साथ ही दाल, हरी सब्जियां और सलाद को भोजन में अधिक शामिल करना बेहतर विकल्प माना जाता है। कई भारतीय परिवारों में एक साथ रोटी और चावल दोनों का सेवन किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी स्थिति में इनमें से किसी एक अनाज की मात्रा घटाने से शरीर में अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम हो सकती है। उनका कहना है कि आधुनिक भारतीय खानपान में कार्बोहाइड्रेट की अधिकता भी फैटी लिवर के बढ़ते मामलों की एक प्रमुख वजह बनती जा रही है।
तेल और घी की मात्रा पर नियंत्रण जरूरी
डॉक्टरों का मानना है कि केवल कार्बोहाइड्रेट ही नहीं, बल्कि भोजन में इस्तेमाल होने वाले तेल और घी की मात्रा पर भी ध्यान देना चाहिए। डॉ. त्रिपाठी के अनुसार औसतन भारतीय परिवारों में प्रति व्यक्ति रोजाना पांच से आठ चम्मच तक तेल या घी का उपयोग हो जाता है, जो स्वास्थ्य के लिहाज से काफी ज्यादा है।
वे सलाह देते हैं कि प्रतिदिन प्रति व्यक्ति तेल की मात्रा लगभग दो से तीन चम्मच तक सीमित रखने की कोशिश करनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर यदि चार लोगों का परिवार हर महीने लगभग तीन लीटर तेल या घी इस्तेमाल कर रहा है, तो इसका मतलब है कि प्रति व्यक्ति रोजाना करीब 25 मिलीलीटर तेल का सेवन हो रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह मात्रा लंबे समय तक लिवर और मेटाबॉलिज्म पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है। इसलिए कुछ महीनों तक तेल की मात्रा घटाने से सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
इंसुलिन स्तर को नियंत्रित रखना भी महत्वपूर्ण
विशेषज्ञ बताते हैं कि फैटी लिवर के पीछे शरीर में बढ़ा हुआ इंसुलिन स्तर भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। डॉक्टर प्रमोद त्रिपाठी के अनुसार इंसुलिन ही शरीर में अतिरिक्त चर्बी को लिवर में जमा होने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए समय-समय पर फास्टिंग इंसुलिन स्तर की जांच करवाना उपयोगी हो सकता है।
उनके मुताबिक यदि फास्टिंग इंसुलिन का स्तर छह से अधिक दिखाई देता है तो यह शुरुआती संकेत हो सकता है, जबकि कई फैटी लिवर मरीजों में यह स्तर दस से भी अधिक पाया जाता है। ऐसे मामलों में विशेषज्ञ की सलाह के साथ जीवनशैली में बदलाव, नियमित व्यायाम और कुछ मामलों में नियंत्रित उपवास जैसी रणनीतियां अपनाई जा सकती हैं। हालांकि किसी भी प्रकार का उपवास शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी बताया जाता है।
नोट: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी प्रकार की बीमारी या उपचार से संबंधित निर्णय लेने से पहले योग्य चिकित्सक से सलाह लेना आवश्यक है।



