International Court of Justice Rohingya Genocide Case: अंतरराष्ट्रीय इंसाफ की नई परिभाषा लिखेंगे रोहिंग्याओं के आंसू
International Court of Justice Rohingya Genocide Case: नीदरलैंड के हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के गलियारों में आज एक ऐसी गूंज सुनाई देगी, जो दशकों तक दुनिया की अंतरात्मा को झकझोरती रहेगी। म्यांमार के खिलाफ रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों के कथित नरसंहार से जुड़ी ऐतिहासिक सुनवाई शुरू हो गई है। संयुक्त राष्ट्र की इस सबसे बड़ी अदालत, जिसे ‘विश्व न्यायालय’ भी कहा जाता है, में न्याय की तराजू पर वह सच तोला जाएगा जिसे सालों तक दबाने की कोशिश की गई। यह (international legal accountability) की दिशा में एक ऐसा मील का पत्थर है, जिसका इंतजार दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ता कर रहे थे।

द गैंबिया बनाम म्यांमार: 11 देशों की एकजुटता
यह कानूनी जंग केवल दो देशों के बीच नहीं, बल्कि वैश्विक मूल्यों की रक्षा का एक बड़ा मंच बन गई है। द गैंबिया ने म्यांमार को अदालत के घेरे में खड़ा किया है, जिसमें 11 प्रभावशाली देशों ने हस्तक्षेप करते हुए गैंबिया का साथ दिया है। इनमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम जैसे देश शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह (genocide convention compliance) का सबसे बड़ा परीक्षण होगा। इस सुनवाई के नतीजे न केवल म्यांमार, बल्कि इजरायल और गाजा जैसे अन्य वैश्विक संघर्षों पर भी गहरा प्रभाव डाल सकते हैं।
नरसंहार की परिभाषा और भविष्य की मिसाल
संयुक्त राष्ट्र के म्यांमार जांच तंत्र के प्रमुख निकोलस कूंजियन के अनुसार, यह मामला अंतरराष्ट्रीय कानून के भविष्य को तय करेगा। इस कोर्ट रूम में यह तय होना है कि आधुनिक युग में (definition of genocide) को किस तरह समझा जाए और उसे साबित करने के मानक क्या होने चाहिए। यह फैसला एक नजीर बनेगा जो भविष्य में दुनिया के किसी भी कोने में होने वाले मानवीय उल्लंघनों के निवारण का रास्ता साफ करेगा। म्यांमार सरकार ने हालांकि इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे केवल एक सैन्य कार्रवाई बताया है।
2017 का वो काला अध्याय और बेबसी का पलायन
इतिहास के पन्ने पलटें तो 2017 की वो तस्वीरें आज भी रूह कंपा देती हैं, जब म्यांमार की सेना की कार्रवाई के बाद 7.30 लाख रोहिंग्याओं को अपना घर छोड़ना पड़ा था। सामूहिक बलात्कार, हत्या और गांवों को आग के हवाले करने जैसी दर्दनाक कहानियों के साथ ये शरणार्थी बांग्लादेश की सीमाओं में दाखिल हुए थे। संयुक्त राष्ट्र की (fact finding mission reports) ने उस वक्त भी इसे नरसंहारात्मक कृत्यों की श्रेणी में रखा था। म्यांमार ने इसे आतंकवाद-रोधी कार्रवाई का नाम दिया, लेकिन लाखों लोगों की आंखों में बसी दहशत कुछ और ही बयां कर रही थी।
बंद कमरे में गूंजेंगी पीड़ितों की सिसकियां
इस सुनवाई का सबसे भावनात्मक पहलू यह है कि पहली बार रोहिंग्या पीड़ितों को किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आपबीती सुनाने का मौका मिलेगा। सुरक्षा और निजता को देखते हुए ये सत्र बंद कमरे में आयोजित किए जा रहे हैं। इन (victim testimony confidentiality) सत्रों में वे महिलाएं और बुजुर्ग गवाही देंगे जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने परिवार को उजड़ते देखा है। तीन सप्ताह तक चलने वाली इस प्रक्रिया के पहले चरण में गैंबिया अपनी दलीलें पेश करेगा, जिसके बाद म्यांमार को अपनी सफाई देने का अवसर दिया जाएगा।
सू की का बचाव और बदलता राजनीतिक परिदृश्य
साल 2019 में जब इस मामले की प्रारंभिक सुनवाई हुई थी, तब म्यांमार की तत्कालीन नेता आंग सान सू की ने खुद हेग आकर सेना का बचाव किया था। उन्होंने आरोपों को भ्रामक बताया था, लेकिन आज स्थितियां बदल चुकी हैं। 2021 के तख्तापलट के बाद म्यांमार में (military junta governance) का शासन है और लोकतंत्र के समर्थकों को बलपूर्वक दबाया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल और भी गहरा गया है कि क्या वर्तमान सत्ता निष्पक्ष जांच में सहयोग करेगी या अंतरराष्ट्रीय आदेशों की अनदेखी का सिलसिला जारी रहेगा।
क्या वाकई मिल पाएगा रोहिंग्याओं को न्याय?
अगर आईसीजे का फैसला द गैंबिया के पक्ष में आता है, तो म्यांमार को नरसंहार रोकने के साथ-साथ पीड़ितों को भारी मुआवजा भी देना होगा। हालांकि, (binding court rulings enforcement) की चुनौती हमेशा बनी रहती है क्योंकि अदालत के पास फैसले लागू करने की अपनी कोई सेना नहीं है। असली राहत तभी संभव है जब वैश्विक शक्तियां म्यांमार पर कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बढ़ाएं। इस ऐतिहासिक फैसले के साल 2026 के अंत तक आने की उम्मीद जताई जा रही है, जो न्याय की उम्मीद लगाए लाखों शरणार्थियों के लिए आखिरी आस है।
म्यांमार का आंतरिक संकट और वैश्विक चिंता
वर्तमान में म्यांमार खुद एक आंतरिक युद्ध और सशस्त्र विद्रोह की आग में जल रहा है। सेना द्वारा लोकतंत्र समर्थकों के दमन ने देश को अस्थिर कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने वहां हो रहे हालिया चुनावों को भी (fraudulent election processes) करार दिया है। ऐसे अराजक माहौल में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की यह सुनवाई म्यांमार के भविष्य और वहां रहने वाले अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए निर्णायक साबित होने वाली है। दुनिया अब हेग की ओर देख रही है कि क्या ‘कानून का शासन’ सत्ता की बंदूकों पर भारी पड़ पाएगा।