Khaleda Zia Death and SAARC Revival: बेगम खालिदा जिया की अंतिम विदाई ने बढ़ाई करीबियां, बदल गए समीकरण…
Khaleda Zia Death and SAARC Revival: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की कद्दावर नेता बेगम खालिदा जिया का 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। 30 दिसंबर 2025 को लंबी बीमारी के बाद उनके निधन की खबर ने न केवल उनके देश बल्कि पूरे दक्षिण एशिया को (Global Political Mourning) शोक में डुबो दिया। तीन बार देश की कमान संभालने वाली खालिदा जिया को ढाका के संसद भवन के साउथ प्लाजा पर लाखों लोगों की मौजूदगी में अंतिम विदाई दी गई। उन्हें उनके पति और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान की कब्र के पास राजकीय सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया गया।

ढाका में जुटा दक्षिण एशिया का नेतृत्व
खालिदा जिया के जनाजे में जो दृश्य दिखाई दिया, उसने कूटनीतिक हलकों में नई हलचल पैदा कर दी है। अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस के साथ भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अन्य पड़ोसी देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी (Diplomatic Presence Dhaka) ने इसे एक बड़ा मंच बना दिया। दुनिया की दूसरी महिला मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष के प्रति दिखाए गए इस सम्मान से अंतरिम सरकार काफी उत्साहित है। प्रोफेसर यूनुस का मानना है कि शोक की इस घड़ी में जिस तरह पड़ोसी देश एकजुट हुए हैं, वह क्षेत्रीय सहयोग की एक नई इबारत लिख सकता है।
‘सार्क’ को पुनर्जीवित करने का प्रोफेसर यूनुस का विजन
प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस ने इस भावुक अवसर को एक बड़े कूटनीतिक अवसर के रूप में देखा है। उनका मानना है कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (SAARC) जो लंबे समय से निष्क्रिय पड़ा है, उसे फिर से (Regional Cooperation Vision) सक्रिय करने का यह सही समय है। यूनुस ने स्पष्ट रूप से कहा कि खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में सार्क की सच्ची भावना जीवित दिखाई दी। उन्होंने उम्मीद जताई है कि यह मंच दक्षिण एशिया के करीब दो अरब लोगों की किस्मत बदलने और उनके हितों की रक्षा करने वाला एक सार्थक जरिया बनेगा।
2014 के बाद से क्यों लगा है सार्क पर ग्रहण?
सार्क की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है, क्योंकि यह संगठन 2016 से लगभग मृतप्राय है। आखिरी द्विवार्षिक शिखर सम्मेलन 2014 में काठमांडू में हुआ था। इसके बाद (Inactive SAARC History) साल 2016 में इस्लामाबाद में होने वाले सम्मेलन का भारत ने बहिष्कार कर दिया था, जिसके पीछे सीमा पार से होने वाला आतंकवाद मुख्य कारण था। बाद में बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान के भी हाथ खींच लेने के कारण इसे रद्द करना पड़ा और तब से यह मंच किसी बड़ी गतिविधि का गवाह नहीं बना है।
भारत का रुख और सुरक्षा संबंधी चिंताएं
सार्क को दोबारा सक्रिय करने के यूनुस के प्रस्ताव पर भारत का रुख काफी सतर्कता भरा रहा है। भारत ने फिलहाल दक्षेस को तुरंत सक्रिय करने की किसी भी संभावना को (India Foreign Policy) सिरे से खारिज किया है। नई दिल्ली का हमेशा से यह मानना रहा है कि क्षेत्रीय सहयोग और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते। हालांकि, विदेश मंत्री का ढाका जाना एक मानवीय और कूटनीतिक शिष्टाचार था, लेकिन इसे सार्क की आधिकारिक बहाली के रूप में देखना जल्दबाजी हो सकती है, क्योंकि भारत अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं पर अडिग है।
मालदीव के मंत्री के साथ हुई अहम चर्चा
प्रोफेसर यूनुस केवल बयानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सक्रिय रूप से अन्य सदस्य देशों का समर्थन भी जुटा रहे हैं। गुरुवार को मालदीव के मंत्री अली हैदर अहमद के साथ हुई मुलाकात में उन्होंने (Bilateral Discussion Maldives) फिर से अपनी बात दोहराई। उन्होंने रेखांकित किया कि दक्षिण एशियाई देश जिस तरह खालिदा जिया के निधन पर शोक साझा करने के लिए एक साथ आए, वह यह साबित करता है कि मतभेदों के बावजूद क्षेत्रीय एकता की भावना अभी भी खत्म नहीं हुई है।
क्या दो अरब लोगों के सपनों को मिलेगा मंच?
सार्क में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे आठ देश शामिल हैं। प्रोफेसर यूनुस का मानना है कि अगर यह संगठन सक्रिय होता है, तो (Socio-Economic Development) दक्षिण एशिया के दो अरब लोगों के लिए व्यापार, शिक्षा और कौशल विकास के नए रास्ते खुल सकते हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर भी अनौपचारिक बैठकें कराने की कोशिश की थी, ताकि गतिरोध को तोड़ा जा सके। अब खालिदा जिया की अंतिम विदाई ने उन्हें अपनी बात मजबूती से रखने का एक और भावुक तर्क दे दिया है।
भविष्य की चुनौतियां और कूटनीति का रास्ता
भले ही बांग्लादेश की अंतरिम सरकार सार्क को लेकर आशान्वित हो, लेकिन पाकिस्तान के साथ भारत के जटिल संबंध और अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति (Geopolitical Challenges SAARC) इस राह में बड़े कांटे हैं। किसी भी क्षेत्रीय संगठन की सफलता के लिए आपसी विश्वास की बहाली अनिवार्य है। खालिदा जिया के निधन पर उपजी यह संवेदना क्या वास्तव में राजनीतिक बर्फ पिघला पाएगी या यह केवल एक क्षणिक एकता बनकर रह जाएगी, यह आने वाले कुछ महीनों की कूटनीतिक हलचलों से साफ हो जाएगा।



