NepalPolitics – सीमा विवाद पर बयान के बाद घिरे प्रधानमंत्री बालेन शाह
NepalPolitics – नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह एक हालिया बयान को लेकर अपने ही देश में तीखी आलोचना का सामना कर रहे हैं। संसद में भारत-नेपाल सीमा विवाद पर की गई उनकी टिप्पणी के बाद राजनीतिक हलकों से लेकर छात्र संगठनों तक में नाराजगी देखने को मिल रही है। कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं और कुछ छात्र समूहों ने प्रधानमंत्री से सार्वजनिक रूप से अपना बयान वापस लेने की मांग की है।

युवाओं के समर्थन से सत्ता तक पहुंचे थे बालेन
बालेन शाह को नेपाल की नई पीढ़ी की राजनीति का चेहरा माना जाता रहा है। पिछले वर्षों में पारंपरिक दलों के प्रति बढ़ते असंतोष के बीच बड़ी संख्या में युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं ने उन्हें समर्थन दिया था। उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा गया, जो पारंपरिक राजनीतिक ढांचे से अलग बदलाव की बात कर रहे थे। हालांकि हाल के महीनों में छात्र समुदाय और सरकार के बीच दूरी बढ़ती दिखाई दी है।
संसद में दिए गए बयान पर बढ़ा विवाद
विवाद की शुरुआत उस वक्त हुई जब प्रधानमंत्री ने संसद में भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से लंबित कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्र से जुड़े सीमा विवाद का उल्लेख किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि सीमा संबंधी मुद्दों को लेकर दोनों देशों के दावों पर व्यापक चर्चा की जरूरत है। साथ ही उन्होंने विवाद के समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग का भी जिक्र किया, जिसके बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हो गई।
छात्र संगठनों ने जताई आपत्ति
प्रधानमंत्री के बयान के बाद कई छात्र संगठनों ने इसे राष्ट्रीय हितों से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए विरोध दर्ज कराया। राजधानी काठमांडू सहित कुछ अन्य स्थानों पर प्रदर्शन किए गए। छात्र नेताओं का कहना है कि सीमा से जुड़े संवेदनशील मामलों पर सरकार को बेहद सावधानी से अपनी बात रखनी चाहिए। कुछ संगठनों ने प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण और माफी की मांग भी की है।
विपक्ष ने भी साधा निशाना
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमला बोला है। संसद के भीतर भी इस बयान को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी से नेपाल की लंबे समय से चली आ रही आधिकारिक स्थिति को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हुई है। राजनीतिक दलों ने सरकार से इस मामले पर स्पष्ट रुख सामने रखने की मांग की है।
पहले से मौजूद था छात्र असंतोष
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब छात्र संगठनों और सरकार के बीच पहले से ही मतभेद मौजूद थे। वर्ष की शुरुआत में शिक्षा संस्थानों में छात्र संगठनों की गतिविधियों को सीमित करने से जुड़े सरकारी फैसले का व्यापक विरोध हुआ था। बाद में यह मामला अदालत तक पहुंचा और न्यायालय ने संबंधित आदेश पर रोक लगा दी थी। उस घटनाक्रम के बाद से छात्र संगठनों और सरकार के रिश्तों में तनाव बना हुआ था।
भारत ने तीसरे पक्ष की भूमिका से किया इनकार
इस पूरे विवाद के बीच भारत ने भी अपनी स्थिति दोहराई है। भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े सभी मुद्दों के समाधान के लिए द्विपक्षीय तंत्र मौजूद है और इन मामलों में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका की आवश्यकता नहीं है। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत के स्थापित माध्यम सक्रिय हैं और इन्हीं के जरिए लंबित मुद्दों का समाधान खोजा जा सकता है।
सीमा विवाद पर जारी है संवाद
भारत और नेपाल के बीच कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। हालांकि दोनों देशों ने समय-समय पर बातचीत के माध्यम से समाधान की दिशा में प्रयास जारी रखे हैं। अधिकारियों का कहना है कि अधिकांश सीमा क्षेत्रों का निर्धारण हो चुका है, जबकि कुछ हिस्सों पर चर्चा अभी भी जारी है। फिलहाल बालेन शाह के बयान ने नेपाल की आंतरिक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक गतिविधियां और तेज हो सकती हैं