झारखण्ड

Ranchi Municipal Corporation: रांची नगर निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण के नए नियम बने संभावित प्रत्याशियों के लिए बड़ी बाधा

Ranchi Municipal Corporation: झारखंड में होने वाले नगर निकाय चुनाव को लेकर चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है, लेकिन रांची नगर निगम के कई वार्डों में संभावित उम्मीदवारों के सामने एक गंभीर तकनीकी संकट खड़ा हो गया है। निगम के कुल 13 वार्ड अत्यंत पिछड़ा वर्ग और पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित किए गए हैं, जहाँ से पार्षद पद के लिए चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे दर्जनों प्रत्याशियों की उम्मीदें अब धूमिल होती नजर आ रही हैं। इसका मुख्य कारण जाति प्रमाण पत्र बनवाने में आ रही जटिलताएं और कड़े नियम हैं। चुनावी मैदान में उतरने का सपना देख रहे कई दावेदार अब प्रमाण पत्र के अभाव में अयोग्य होने की कगार पर हैं, क्योंकि उनके पास आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।

Ranchi Municipal Corporation: रांची नगर निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण के नए नियम बने संभावित प्रत्याशियों के लिए बड़ी बाधा
Ranchi Municipal Corporation: रांची नगर निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण के नए नियम बने संभावित प्रत्याशियों के लिए बड़ी बाधा

1978 के भूमि दस्तावेजों की अनिवार्यता बनी मुख्य अड़चन

झारखंड सरकार के कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाने हेतु वर्ष 1978 या उससे पहले के भूमि दस्तावेज यानी डीड प्रस्तुत करना अनिवार्य है। रांची जैसे विकसित शहर में बड़ी संख्या में लोग बिहार और अन्य पड़ोसी राज्यों से आकर बसे हैं। इनमें से अधिकतर लोग 1978 के बाद यहाँ आए हैं या उनके पास पुराने भू-दस्तावेज नहीं हैं। ऐसे में 30-40 वर्षों से राजधानी में रह रहे पिछड़ा वर्ग के लोगों के लिए नए सिरे से ओबीसी प्रमाण पत्र बनवाना अब लगभग असंभव हो गया है। भूमि के मालिकाना हक की इस शर्त ने कई प्रभावशाली दावेदारों को चुनावी दौड़ से बाहर कर दिया है।

आरक्षित वार्डों का समीकरण और संभावित उम्मीदवारों की मुश्किल

रांची नगर निगम के 53 वार्डों में से 9 वार्ड अत्यंत पिछड़ा वर्ग (BC-1) के लिए और 4 वार्ड पिछड़ा वर्ग (BC-2) के लिए आरक्षित हैं। आरक्षित श्रेणी में वार्ड संख्या 11, 15, 16, 17, 21, 22, 23, 38 और 49 को रखा गया है, जबकि पिछड़ा वर्ग दो के लिए वार्ड 20, 26, 27 और 28 आरक्षित हैं। इन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवारों की संख्या 100 से अधिक होने का अनुमान था। जो प्रत्याशी पहले से डिजिटल या वैध प्रमाण पत्र रखते हैं, वे तो सुरक्षित हैं, लेकिन पहली बार चुनावी समर में भाग्य आजमाने वाले नए चेहरों के लिए नियमों की यह दीवार पार करना चुनौतीपूर्ण है। इसके अलावा वार्ड समिति के अभाव और स्थानीय जांच की प्रक्रिया की सही जानकारी न होने से भी कई आवेदन समय पर नहीं हो सके।

पुराने मैनुअल प्रमाण पत्रों की वैधता पर संशय की स्थिति

वर्ष 2013 से झारखंड में जाति प्रमाण पत्र ऑनलाइन बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, जबकि 2019 में सरकार ने इसके लिए विस्तृत गाइडलाइन जारी की। इससे पहले, वर्ष 2008 के निकाय चुनाव के दौरान कई पार्षदों ने मैनुअल तरीके से अपने प्रमाण पत्र बनवाए थे। वर्तमान चुनाव में पुराने मैनुअल प्रमाण पत्र मान्य होंगे या नहीं, इसे लेकर प्रत्याशियों के बीच भारी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। प्रशासन और संबंधित अधिकारी भी इस विषय पर स्पष्ट उत्तर देने से बच रहे हैं। बिना भूमि स्वामित्व के दशकों से किराए या लीज पर रह रहे पिछड़ा वर्ग के परिवारों के पास अब कोई ठोस विकल्प नहीं बचा है, जिससे वे अपनी जातिगत पहचान का सरकारी साक्ष्य प्रस्तुत कर सकें।

बाहरी राज्यों से आए निवासियों के लिए बंद हुए रास्ते

राजधानी रांची की जनसांख्यिकी में अन्य प्रांतों से आकर बसे लोगों की एक बड़ी हिस्सेदारी है। वर्तमान नियम उन लोगों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहे हैं जिन्होंने 1978 की कट-ऑफ तारीख के बाद झारखंड को अपना घर बनाया। हालांकि वे वर्षों से यहाँ के मतदाता हैं और स्थानीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं, लेकिन जाति प्रमाण पत्र के नए मानकों ने उनके लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। कई संभावित प्रत्याशियों का कहना है कि वे स्थानीय जांच और वार्ड पार्षद की अनुशंसा के आधार पर प्रमाण पत्र निर्गत करने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन सरकारी आदेशों की सख्ती ने उनकी महीनों की मेहनत पर पानी फेर दिया है

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