LakshmiPuja – पढ़ें अधिक मास पूर्णिमा पर लक्ष्मी-नारायण पूजा का महत्व और शुभ समय
LakshmiPuja – हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि को अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्र देव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मास की पूर्णिमा का अवसर विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन व्रत, दान, स्नान और पूजा-पाठ के माध्यम से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के जानकारों के अनुसार, इस बार पूर्णिमा से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अलग-अलग तिथियों पर विशेष महत्व बताया गया है। व्रत और संध्या पूजन एक दिन किए जा सकते हैं, जबकि स्नान और दान का महत्व उदया तिथि के अनुसार अगले दिन माना गया है।
अधिक मास पूर्णिमा पर पूजा की परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की संयुक्त पूजा करनी चाहिए। यदि किसी कारणवश पवित्र नदी में स्नान संभव न हो, तो स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर घर पर भी धार्मिक विधि पूरी की जा सकती है।
पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पीले रंग के पुष्प, फल, चंदन और वस्त्र अर्पित करने की परंपरा है। वहीं माता लक्ष्मी को लाल या गुलाबी रंग के फूल, श्रृंगार सामग्री और सुगंधित चंदन अर्पित किया जाता है। श्रद्धालु पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाकर आराधना करते हैं।
सत्यनारायण कथा और व्रत का महत्व
पूर्णिमा तिथि पर सत्यनारायण कथा का पाठ भी शुभ माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक कथा सुनने या पढ़ने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
जो लोग पूर्णिमा व्रत रखते हैं, वे पूजा से पहले संकल्प लेते हैं और दिनभर नियमों का पालन करते हैं। पूजा के अंत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती की जाती है तथा खीर, फल, पंचामृत और सूखे मेवों का भोग लगाया जाता है।
चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा
पूर्णिमा का संबंध चंद्रमा से भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रोदय के बाद जल में कच्चा दूध मिलाकर चंद्र देव को अर्घ्य देना शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु इस अनुष्ठान को मानसिक शांति और सुख-समृद्धि की कामना के साथ करते हैं।
इस अवसर पर पूजा के समापन के बाद ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करने की भी परंपरा है, जिसे धार्मिक अनुष्ठान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
प्रमुख शुभ मुहूर्त
धार्मिक पंचांग के अनुसार इस अवसर पर कई शुभ समय बताए गए हैं, जिनमें पूजा और अन्य धार्मिक कार्य किए जा सकते हैं।
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:03 बजे से 04:43 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: 11:51 बजे से 12:46 बजे तक
- विजय मुहूर्त: 02:37 बजे से 03:32 बजे तक
- गोधूलि मुहूर्त: 07:12 बजे से 07:33 बजे तक
- निशिता मुहूर्त: रात 11:58 बजे से 12:39 बजे तक
पंचांग के अनुसार चंद्रोदय का समय शाम 06:40 बजे बताया गया है। इसी के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने का विधान माना जाता है।
स्नान-दान और विशेष उपाय
उदया तिथि के अनुसार स्नान और दान का विशेष महत्व अगले दिन प्रातःकाल माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस समय किए गए दान-पुण्य को शुभ फलदायी माना जाता है।
इस दिन श्रद्धालु श्री सूक्तम या कनकधारा स्तोत्र का पाठ भी करते हैं। मान्यता है कि इन स्तोत्रों का पाठ माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। हालांकि, धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े सभी फल और लाभ आस्था एवं व्यक्तिगत विश्वास पर आधारित होते हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और उपलब्ध पंचांग जानकारी पर आधारित है। विभिन्न परंपराओं और क्षेत्रों के अनुसार पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर हो सकता है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले संबंधित विद्वान या विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित रहेगा।