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Diplomacy – पश्चिम एशिया तनाव के बीच यूएई दौरे से भारत ने दिया बड़ा संदेश

Diplomacy – पश्चिम एशिया में लगातार बदलते हालात और क्षेत्रीय तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संयुक्त अरब अमीरात दौरा कई मायनों में अहम माना जा रहा है। यूरोप यात्रा की शुरुआत यूएई से करना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि भारत मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में अपने भरोसेमंद साझेदारों के साथ संबंधों को और मजबूत करना चाहता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत और यूएई के बीच राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक सहयोग तेजी से बढ़ा है, जिसका असर पूरे क्षेत्रीय समीकरण पर दिखाई दे रहा है।

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भारत-यूएई संबंधों में बढ़ी रणनीतिक नजदीकी

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और यूएई के बीच अब रिश्ते केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे हैं। दोनों देश रक्षा, ऊर्जा, तकनीक और कूटनीतिक सहयोग के नए आयामों पर साथ काम कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के दौरान यूएई ने कई मौकों पर भारत के हितों के प्रति सकारात्मक रुख दिखाया है। यही वजह है कि मौजूदा दौर में यूएई को भारत का सबसे विश्वसनीय सहयोगी माना जा रहा है।

भारत ने भी यूएई की सुरक्षा चिंताओं पर खुलकर समर्थन जताया है। क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच दोनों देशों की बढ़ती साझेदारी को दक्षिण एशिया और खाड़ी क्षेत्र की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पाकिस्तान को लेकर भी अहम संकेत

राजनयिक हलकों में इस दौरे को पाकिस्तान के लिए एक स्पष्ट संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है। हाल के महीनों में पाकिस्तान और यूएई के रिश्तों में तनाव की खबरें सामने आई हैं। यूएई द्वारा पाकिस्तान से अरबों डॉलर का कर्ज लौटाने की मांग और वीजा नियमों में सख्ती को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने बीते वर्षों में खाड़ी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर पाकिस्तान की उस रणनीति को काफी हद तक कमजोर किया है, जिसमें वह कश्मीर मुद्दे को मुस्लिम देशों के मंच पर उठाता रहा है। यही वजह रही कि इस्लामिक सहयोग संगठन की बैठक में भारत को विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था, जबकि पाकिस्तान ने इसका विरोध किया था।

ऊर्जा सुरक्षा पर हो सकती है अहम चर्चा

प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के दौरान ऊर्जा सुरक्षा भी प्रमुख एजेंडा मानी जा रही है। भारत और यूएई के बीच एलएनजी आपूर्ति को लेकर पहले से समझौता हो चुका है, जिसके तहत आने वाले वर्षों में भारत को बड़ी मात्रा में गैस आपूर्ति की जानी है। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए संभावना जताई जा रही है कि भारत इस आपूर्ति प्रक्रिया को तय समय से पहले शुरू करने का आग्रह कर सकता है।

भारत लगातार अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखने के लिए खाड़ी देशों के साथ दीर्घकालिक समझौतों पर जोर दे रहा है। ऐसे में यूएई की भूमिका भारत के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

2015 के बाद रिश्तों में आया बड़ा बदलाव

भारत और यूएई के संबंध लंबे समय से व्यापारिक स्तर पर मजबूत रहे हैं, लेकिन वर्ष 2015 के बाद दोनों देशों के रिश्तों में नई गति देखने को मिली। प्रधानमंत्री मोदी की यूएई यात्रा ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक भरोसे को नई दिशा दी। इसके बाद कई उच्चस्तरीय बैठकों और समझौतों के जरिए संबंध लगातार मजबूत होते गए।

आज दोनों देशों के बीच सहयोग के प्रमुख क्षेत्र व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, हरित तकनीक और निवेश बन चुके हैं। यूएई में बड़ी संख्या में भारतीय समुदाय भी दोनों देशों के रिश्तों की मजबूत कड़ी माना जाता है।

व्यापार और निवेश पर बढ़ा फोकस

भारत और यूएई के बीच मुक्त व्यापार समझौते के बाद द्विपक्षीय कारोबार में तेजी आई है। दोनों देशों ने आने वाले वर्षों में व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य तय किया है। निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में भी कई नई संभावनाएं तलाश की जा रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक हालात में भारत-यूएई साझेदारी केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभाव डालने की क्षमता रखती है।

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