Gold – बढ़ते आयात और महंगे दामों ने बढ़ाई सरकार की चिंता
Gold – भारत में सोने की बढ़ती मांग अब केवल उपभोक्ता पसंद का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है। कच्चे तेल के बाद सोना भारत का दूसरा सबसे बड़ा आयातित उत्पाद बन चुका है। लगातार बढ़ते आयात और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उछाल के कारण देश पर विदेशी मुद्रा का दबाव बढ़ रहा है। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोगों से गैर-जरूरी सोने की खरीदारी टालने की अपील को आर्थिक हालात से जोड़कर देखा जा रहा है।

भारत लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल रहा है। शादी-ब्याह, त्योहारों और निवेश के रूप में सोने की मांग लगातार बनी रहती है। हालांकि अब यही मांग सरकार और आर्थिक विशेषज्ञों के लिए चिंता का कारण बन रही है। आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में सोने का आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। कीमतों में भारी बढ़ोतरी के बावजूद आयात पर खर्च बढ़ता गया, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ा है।
कीमत बढ़ी तो घटा आयात का आंकड़ा
हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दाम तेजी से बढ़े हैं। इसका असर भारतीय बाजार पर भी साफ दिखाई दिया। मात्रा के लिहाज से सोने का आयात कुछ कम जरूर हुआ, लेकिन महंगे दामों के कारण कुल भुगतान पहले से ज्यादा करना पड़ा। अप्रैल 2026 में सोने का आयात घटकर लगभग 15 टन तक पहुंच गया, जिसे पिछले तीन दशक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि जब सोने की कीमतें बढ़ती हैं, तब आयात बिल भी तेजी से ऊपर जाता है। इससे व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा दोनों प्रभावित होते हैं। डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव बनता है और उसकी कीमत कमजोर होती चली जाती है।
पहले भी उठाए जा चुके हैं सख्त कदम
भारत में सोने की मांग को नियंत्रित करने के लिए पहले भी कई बार बड़े फैसले लिए जा चुके हैं। वर्ष 1968 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने गोल्ड कंट्रोल एक्ट लागू किया था। उस समय देश विदेशी मुद्रा संकट और आर्थिक दबाव से गुजर रहा था। इस कानून के तहत लोगों के लिए सोने की ईंटें और सिक्के रखने पर रोक लगा दी गई थी। केवल आभूषण के रूप में सोना रखने की अनुमति दी गई थी।
इसके बाद वर्ष 2013 में भी देश को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ा। डॉलर की बढ़ती मांग और कमजोर होते रुपये के बीच तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने लोगों से कुछ समय तक सोना खरीदने से बचने की अपील की थी। उस दौर में चालू खाता घाटा काफी बढ़ गया था और सरकार विदेशी मुद्रा बचाने के उपाय तलाश रही थी।
1991 का आर्थिक संकट आज भी याद
भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का संकट सबसे गंभीर दौरों में गिना जाता है। उस समय देश के पास बेहद सीमित विदेशी मुद्रा बची थी और आयात भुगतान करना मुश्किल हो गया था। हालात इतने खराब हो गए थे कि सरकार को देश का सोना विदेशों में गिरवी रखकर कर्ज लेना पड़ा। रिजर्व बैंक के माध्यम से बड़ी मात्रा में सोना स्विट्जरलैंड और इंग्लैंड भेजा गया था। इस फैसले ने उस समय देश की आर्थिक स्थिति की गंभीरता को उजागर कर दिया था।
दूसरे देशों ने भी लगाए नियंत्रण
केवल भारत ही नहीं, बल्कि कई अन्य देश भी सोने के आयात को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग उपाय अपनाते रहे हैं। चीन में सोने के आयात के लिए विशेष लाइसेंस व्यवस्था लागू है। वहीं तुर्की ने व्यापार घाटा कम करने के लिए आयात कोटा तय किया हुआ है। अमेरिका ने भी 1971 में डॉलर और सोने के संबंधों में बड़ा बदलाव करते हुए आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता सोना नहीं, बल्कि उसके बदले बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा है। यदि आयात लगातार बढ़ता रहा तो इसका असर रुपये की मजबूती और आर्थिक संतुलन दोनों पर पड़ सकता है।