ElectionRules – बाइक प्रतिबंध पर हाई कोर्ट की सख्ती, आयोग को राहत नहीं…
ElectionRules – पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान दोपहिया वाहनों पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले में हस्तक्षेप करते हुए महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की आड़ में आम नागरिकों की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस फैसले के साथ ही आयोग द्वारा जारी बाइक बैन को निरस्त कर दिया गया है, जिससे आम लोगों को राहत मिली है।

अदालत ने प्रतिबंध के औचित्य पर उठाए सवाल
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि आखिर किन परिस्थितियों में बाइक चलाने पर पूर्ण रोक लगाने की जरूरत पड़ी। अदालत ने टिप्पणी की कि चुनाव की निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके नाम पर आम नागरिकों की दैनिक गतिविधियों पर अनावश्यक रोक लगाना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित पक्ष यह बताने में असफल रहा कि किस कानूनी आधार पर इतना व्यापक आदेश लागू किया गया।
आंशिक पाबंदियों को दी गई मंजूरी
हालांकि अदालत ने पूरी तरह से सभी प्रतिबंध हटाने के बजाय कुछ सीमित पाबंदियों को बरकरार रखा है। कोर्ट ने चुनाव से पहले बाइक रैलियों पर रोक को सही माना और इसे जारी रखने की अनुमति दी। इसके अलावा मतदान के दिन से 12 घंटे पहले तक बाइक पर पीछे बैठकर यात्रा करने पर भी रोक लगाने के निर्णय को स्वीकार किया गया। हालांकि, मेडिकल आपात स्थिति, छात्रों को स्कूल ले जाने या अन्य आवश्यक कार्यों के लिए छूट देने की बात भी स्पष्ट की गई है।
चुनाव आयोग के आदेश पर पहले भी उठा था विरोध
चुनाव आयोग ने 20 अप्रैल को एक अधिसूचना जारी कर कहा था कि मतदान से दो दिन पहले से लेकर मतदान के दिन तक शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे के बीच बाइक चलाने पर रोक रहेगी। इस निर्णय का व्यापक विरोध हुआ था, क्योंकि इसे आम जनता के लिए असुविधाजनक माना गया। कई लोगों ने इसे अत्यधिक सख्त कदम बताते हुए इसकी आलोचना की थी।
आयोग ने दी थी सुरक्षा की दलील
आयोग की ओर से इस फैसले का बचाव करते हुए कहा गया था कि यह कदम असामाजिक तत्वों और संभावित हिंसा को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है। अधिकारियों का कहना था कि चुनाव के दौरान कुछ समूह बाइक के माध्यम से अव्यवस्था फैलाने की कोशिश करते हैं, जिसे नियंत्रित करने के लिए यह कदम जरूरी था। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना और व्यापक प्रतिबंध को अनुपयुक्त बताया।
संवैधानिक अधिकारों का भी रखा गया ध्यान
सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 324(1) का उल्लेख भी किया गया, जो चुनाव आयोग को व्यापक अधिकार प्रदान करता है। इसके बावजूद अदालत ने स्पष्ट किया कि इन अधिकारों का उपयोग संतुलित तरीके से किया जाना चाहिए और इससे नागरिकों के मूल अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए। कोर्ट ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके लिए ऐसे उपाय नहीं अपनाए जाने चाहिए जो आम जीवन को बाधित करें।
आगे की प्रक्रिया पर नजर
इस फैसले के बाद अब चुनाव आयोग को अपने दिशा-निर्देशों में आवश्यक बदलाव करने होंगे। अदालत के आदेश से यह संकेत भी मिलता है कि भविष्य में ऐसे किसी भी फैसले को लागू करने से पहले उसके कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना होगा। फिलहाल, आम लोगों के लिए यह निर्णय राहत भरा माना जा रहा है, जबकि चुनावी व्यवस्थाओं पर इसका असर आगे देखने को मिलेगा।