FaltaBypoll – तो यहाँ से कमजोर हुई थी टीएमसी की पकड़…
FaltaBypoll – पश्चिम बंगाल की फलता विधानसभा सीट, जिसे लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता रहा, अब बदलते राजनीतिक माहौल का केंद्र बन गई है। हाल के घटनाक्रमों ने यहां की राजनीति को पूरी तरह नई दिशा दे दी है। खास तौर पर प्रभावशाली नेता जहांगीर खान के चुनावी मैदान से हटने के बाद इलाके में राजनीतिक संतुलन तेजी से बदलता नजर आ रहा है। यह क्षेत्र डायमंड हार्बर लोकसभा सीट के अंतर्गत आता है, जिसका प्रतिनिधित्व अभिषेक बनर्जी करते हैं।

कुछ ही दिनों में बदल गया माहौल
29 अप्रैल को हुए मतदान के दौरान फलता में तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव साफ दिखाई दे रहा था। पूरे इलाके में पार्टी के झंडे, पोस्टर और कार्यकर्ताओं की सक्रियता नजर आ रही थी। लेकिन पुनर्मतदान से पहले हालात तेजी से बदल गए। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, जिन इलाकों में पहले टीएमसी का दबदबा दिखता था, वहां अब दूसरे दलों की मौजूदगी अधिक दिखाई देने लगी है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों में राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बदल गया है। कई जगहों पर विपक्षी दलों ने अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिशें तेज कर दी हैं, जबकि टीएमसी का प्रचार पहले की तुलना में काफी सीमित नजर आया।
जहांगीर खान के हटने से बदला समीकरण
फलता की राजनीति में जहांगीर खान को लंबे समय से प्रभावशाली चेहरा माना जाता रहा है। माना जाता है कि क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ की वजह से तृणमूल कांग्रेस को लगातार फायदा मिलता था। हालांकि, चुनाव प्रक्रिया के बीच उनके मैदान छोड़ने के फैसले ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी।
रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव से हटने के बाद जहांगीर खान सार्वजनिक रूप से भी कम नजर आए। मतदान के दिन भी उनकी अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी रही। स्थानीय लोगों ने बताया कि चुनाव से हटने के फैसले के बाद से उन्होंने क्षेत्र में सक्रियता लगभग बंद कर दी थी।
अभिषेक बनर्जी से करीबी की चर्चा
जहांगीर खान को तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से पार्टी को भारी समर्थन मिला था। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि खान के हटने से पार्टी की स्थानीय रणनीति प्रभावित हुई है।
हालांकि, तृणमूल कांग्रेस की ओर से इसे व्यक्तिगत फैसला बताया गया और पार्टी ने सार्वजनिक रूप से दूरी बनाए रखी। इसके बावजूद विपक्षी दल इस घटनाक्रम को टीएमसी की कमजोर होती पकड़ से जोड़कर देख रहे हैं।
पुनर्मतदान में दिखी भारी भागीदारी
फलता सीट पर हुए पुनर्मतदान में मतदाताओं की अच्छी भागीदारी देखने को मिली। निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, मतदान प्रतिशत 86 फीसदी से अधिक रहा। मतदान के दौरान सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई थी और केंद्रीय बलों की कई कंपनियां तैनात की गई थीं।
पुनर्मतदान का फैसला पहले चरण के मतदान के बाद सामने आई शिकायतों के चलते लिया गया था। कुछ मतदान केंद्रों पर ईवीएम से जुड़ी तकनीकी और सुरक्षा संबंधी आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। इसके बाद चुनाव आयोग ने दोबारा मतदान कराने का निर्णय लिया।
मुख्य मुकाबला भाजपा और वाम दल के बीच
जहांगीर खान के चुनाव से बाहर होने के बाद अब सीट पर मुकाबला पूरी तरह बदल गया है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस बार मुख्य प्रतिस्पर्धा भारतीय जनता पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों के बीच मानी जा रही है। कांग्रेस ने भी इस सीट पर अपना उम्मीदवार उतारा है, जिससे मुकाबला बहुकोणीय हो गया है।
क्षेत्र में बदलते राजनीतिक माहौल को देखते हुए सभी दल अंतिम समय तक मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। आने वाले नतीजे यह तय करेंगे कि फलता में सियासी संतुलन किस दिशा में जाता है।
भवानीपुर के बाद बढ़ी राजनीतिक चर्चा
राज्य की राजनीति में यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि हाल के चुनावी परिणामों में भवानीपुर जैसी महत्वपूर्ण सीट पर भी बड़ा बदलाव देखने को मिला था। ऐसे में फलता की स्थिति को लेकर राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षक अब इस सीट को पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीतिक तस्वीर के संकेत के तौर पर देख रहे हैं।