LegalCase – सुप्रीम कोर्ट ने झूठे घरेलू हिंसा मामलों पर जताई सख्त चिंता
LegalCase – सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान घरेलू हिंसा कानून के संभावित दुरुपयोग पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने एक ऐसे मामले में हस्तक्षेप किया, जिसमें तलाक के बाद पत्नी द्वारा भारी भरकम सोने की मांग का दावा किया गया था। न्यायालय ने पाया कि आरोपों में ठोस आधार का अभाव है और इस तरह के मामलों को शुरुआती स्तर पर ही रोका जाना चाहिए ताकि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो।

मामले की पृष्ठभूमि और अदालत तक पहुंच
यह विवाद तब सामने आया जब पति ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। दोनों पक्षों के बीच पहले ही आपसी सहमति से समझौता हो चुका था। इसके बावजूद पत्नी की याचिका पर हाईकोर्ट ने मामले की आगे सुनवाई की अनुमति दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय की समीक्षा करते हुए इसे उचित नहीं माना और हस्तक्षेप करते हुए आदेश को पलट दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब पक्षकार समझौते पर पहुंच चुके हों, तो बिना ठोस नए आधार के मामले को दोबारा खोलना न्यायसंगत नहीं है।
170 करोड़ के सोने के दावे पर सवाल
मामले में सबसे अधिक चर्चा महिला के उस दावे को लेकर हुई, जिसमें उसने कहा कि उसे तलाक के बदले 170 करोड़ रुपये मूल्य का सोना देने का वादा किया गया था। इसमें 120 करोड़ रुपये के गहने और 50 करोड़ रुपये के सोने के बिस्किट शामिल बताए गए। हालांकि अदालत के समक्ष इस दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज या विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जा सका। न्यायालय ने पाया कि इस कथित समझौते का उल्लेख न तो लिखित दस्तावेजों में था और न ही पहले किसी रिकॉर्ड में। यह दावा बाद में घरेलू हिंसा की शिकायत के साथ सामने आया, जिसे अदालत ने संदेहास्पद माना।
वास्तविक समझौते की शर्तें क्या थीं
रिकॉर्ड के अनुसार, इस दंपति का विवाह वर्ष 2000 में हुआ था और समय के साथ संबंधों में दूरी बढ़ती गई। दोनों वर्ष 2022-23 से अलग रह रहे थे। पति ने 2023 में तलाक की प्रक्रिया शुरू की, जिसके बाद मामला मध्यस्थता में गया। 16 मई 2024 को दोनों पक्षों के बीच अंतिम समझौता हुआ, जिसमें 1.5 करोड़ रुपये का पूर्ण और अंतिम निपटारा तय किया गया। इस समझौते के आधार पर तलाक की पहली प्रक्रिया पूरी हो गई थी और आर्थिक लेन-देन भी संपन्न हो चुका था। बाद में पत्नी ने दूसरी प्रक्रिया से पीछे हटते हुए घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया।
घरेलू हिंसा के आरोपों पर अदालत की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के दौरान पाया कि घरेलू हिंसा के आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे। शिकायत में किसी विशेष घटना, तारीख या व्यक्ति का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। अदालत ने यह भी नोट किया कि विवाह के लंबे समय के दौरान पहले कभी इस प्रकार के आरोप नहीं लगाए गए थे। शिकायत उस समय दर्ज की गई जब समझौते का अधिकांश हिस्सा पूरा हो चुका था। इस परिस्थिति को देखते हुए अदालत ने संकेत दिया कि आरोप बाद में रणनीतिक रूप से लगाए गए प्रतीत होते हैं।
न्यायालय की सख्त टिप्पणी और चेतावनी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद भावनात्मक हो सकते हैं, लेकिन केवल भावनाओं के आधार पर आपराधिक मामलों को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। यदि ऐसा होने दिया गया तो कानून का दुरुपयोग बढ़ेगा और निर्दोष पक्षों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। अदालत ने यह भी कहा कि एक बार स्वेच्छा से किए गए समझौते से बिना पर्याप्त कारण पीछे हटना न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है।
अनुच्छेद 142 के तहत अंतिम निर्णय
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए विवाह को समाप्त घोषित कर दिया। अदालत ने कहा कि यह संबंध पूरी तरह टूट चुका है और इसके पुनर्जीवित होने की कोई संभावना नहीं है। साथ ही निर्देश दिया गया कि समझौते के तहत शेष भुगतान तय समय सीमा में पूरा किया जाए, जमा राशि वापस की जाए और दोनों पक्षों के बीच लंबित सभी कानूनी मामलों को समाप्त माना जाए।