MGNREGA Name Change Controversy: डीके शिवकुमार ने केंद्र पर लगाया रोजगार का गला घोंटने का बड़ा आरोप, जानें पूरा मामला
MGNREGA Name Change Controversy: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा का नाम बदलकर अब ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन’ (ग्रामीण) यानी ‘वीबी-जी राम जी’ कर दिया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह कानून प्रभावी हो गया है, लेकिन इसके साथ ही देशभर में (Political Turmoil) का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस बदलाव को महात्मा गांधी की विरासत को मिटाने और ग्रामीण रोजगार के अधिकार को कमजोर करने की साजिश बता रहे हैं। इसी कड़ी में कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

ग्राम पंचायतों को कमजोर करने का सीधा आरोप
कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने मीडिया से बात करते हुए इस नए कानून की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि जिस योजना ने देश के करोड़ों ग्रामीणों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया, अब उसका (Constitutional Rights) छीना जा रहा है। शिवकुमार के अनुसार, कांग्रेस ने संविधान के तहत देश के हर नागरिक को काम देने की व्यवस्था की थी, लेकिन मौजूदा सरकार इस आधार को ही हिलाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह बदलाव ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा।
फंडिंग पैटर्न में बदलाव से योजना को खत्म करने की साजिश
शिवकुमार ने एक बेहद गंभीर तकनीकी पक्ष को उजागर करते हुए बताया कि पहले नरेगा के तहत होने वाले विकास कार्यों में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी का अनुपात 90:10 था। यानी केंद्र सरकार 90 प्रतिशत खर्च उठाती थी। लेकिन अब (Funding Ratio) को बदलकर 60:40 कर दिया गया है। उनका दावा है कि राज्यों पर आर्थिक बोझ बढ़ाकर केंद्र सरकार इस योजना को धीरे-धीरे अप्रासंगिक और अंततः खत्म करना चाहती है। उन्होंने इसे योजना का ‘गला घोंटने’ की एक सोची-समझी रणनीति करार दिया है।
कनकपुरा से जुड़ा है इस योजना का गौरवशाली इतिहास
डीके शिवकुमार ने याद दिलाया कि उनका विधानसभा क्षेत्र कनकपुरा वह स्थान है जहाँ उन्होंने देश में सबसे पहले नरेगा योजना का प्रयोग किया था। उन्होंने (Political Vendetta) का आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा ने जानबूझकर वहां जांच बैठाई और विकास कार्यों में अनियमितताओं के झूठे आरोप लगाए। शिवकुमार के अनुसार, इस योजना ने ग्रामीण ढांचे को मजबूत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, जिसे अब राजनीतिक लाभ के लिए निशाना बनाया जा रहा है।
पंचायती राज सिस्टम के लिए एक बड़ा सदमा
डिप्टी सीएम का मानना है कि ‘वीबी-जी राम जी’ कानून के आने से पूरा पंचायती राज सिस्टम और उसके अधिकारी गहरे सदमे में हैं। पहले नरेगा के तहत काम करने वाले मजदूरों का पैसा सीधे उनके बैंक खातों में (Direct Benefit Transfer) के जरिए जाता था, जिससे पारदर्शिता बनी रहती थी। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि भाजपा ने कांग्रेस सरकार द्वारा दिए गए सांविधानिक अधिकार को छूने की हिम्मत की है, जो कि भाजपा के राजनीतिक अंत की शुरुआत साबित होगी।
दिल्ली में बुलाई गई आपात बैठक
इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियंक खरगे ने दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। डीके शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार ग्राम पंचायतों को (Local Governance) के स्तर पर सशक्त बनाने के लिए हर संभव कदम उठाएगी और इस नए कानून के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद रखेगी। विपक्षी दलों का मानना है कि नाम बदलना केवल एक प्रतीकात्मक बदलाव नहीं है, बल्कि यह योजना के मूल सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ है।
नरेगा से मनरेगा और अब ‘वीबी-जी राम जी’ का सफर
गौरतलब है कि इस योजना की शुरुआत साल 2005 में ‘नरेगा’ के नाम से हुई थी। तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने इसे ग्रामीण बेरोजगारी (Rural Employment) को खत्म करने के लिए एक क्रांतिकारी कदम के रूप में लागू किया था। साल 2009 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को सम्मान देने के लिए इसका नाम बदलकर ‘मनरेगा’ कर दिया गया था। इस कानून के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को साल में कम से कम 100 दिन के रोजगार की कानूनी गारंटी मिलती है, और काम न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता देने का भी कड़ा प्रावधान है।
क्या ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलेगा नया कानून?
सरकार का पक्ष है कि ‘विकसित भारत’ के विजन के तहत इस मिशन को और अधिक व्यापक और आजीविका उन्मुख बनाया गया है। लेकिन विपक्ष इसे केवल (Rebranding Strategy) के तौर पर देख रहा है। विवाद इस बात पर भी है कि क्या नाम बदलने से योजना के क्रियान्वयन और उसकी पारदर्शिता पर कोई असर पड़ेगा? फिलहाल, डीके शिवकुमार के कड़े रुख ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा सड़क से लेकर संसद तक गूंजने वाला है।



