Reservation – सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से आरक्षण नियमों पर नई बहस तेज
Reservation – सिविल सेवा अधिकारियों के बच्चों को आरक्षण का लाभ मिलने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने देश में आरक्षण व्यवस्था को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। अदालत ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि जब कोई परिवार सामाजिक और प्रशासनिक रूप से मजबूत स्थिति में पहुंच चुका हो, तब क्या उसे पिछड़े वर्ग के आरक्षण का लाभ जारी रहना चाहिए। इस टिप्पणी के बाद विभिन्न आरक्षण श्रेणियों के मौजूदा नियम और उनके आधार फिर चर्चा में आ गए हैं।

OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था
अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC श्रेणी में आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर का नियम लागू होता है। इसकी कानूनी रूपरेखा 1992 के इंद्रा साहनी फैसले के बाद तय हुई थी। इस व्यवस्था का उद्देश्य उन परिवारों को आरक्षण के दायरे से बाहर करना है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पहले ही मजबूत स्थिति में पहुंच चुके हैं।
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के नियमों के अनुसार, IAS, IPS और अन्य Group A अधिकारियों के बच्चों को क्रीमी लेयर में माना जाता है। ऐसे उम्मीदवार OBC आरक्षण का लाभ नहीं ले सकते। निजी नौकरी या व्यवसाय से जुड़े परिवारों के लिए आय सीमा लागू होती है। यदि परिवार की वार्षिक आय लगातार तीन वर्षों तक तय सीमा से ऊपर रहती है, तो आरक्षण का लाभ समाप्त हो जाता है।
SC और ST वर्गों के लिए अलग आधार
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणियों में आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव माना गया है। इसी वजह से इन वर्गों में लंबे समय तक क्रीमी लेयर जैसी व्यवस्था लागू नहीं की गई।
हालांकि हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने राज्यों को SC और ST श्रेणियों के भीतर उप-वर्गीकरण का अधिकार दिया है। अदालत ने कहा कि आरक्षण का लाभ उन समुदायों तक भी पहुंचना चाहिए जो इन वर्गों के भीतर सबसे अधिक वंचित हैं। कुछ न्यायाधीशों ने यह भी सुझाव दिया कि राज्यों को इन श्रेणियों में सामाजिक रूप से मजबूत समूहों की पहचान करने पर विचार करना चाहिए।
EWS कोटा पूरी तरह आर्थिक आधार पर
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS श्रेणी सामान्य वर्ग के उन परिवारों के लिए बनाई गई है, जिनकी आय और संपत्ति तय सीमा के भीतर आती है। इसमें सामाजिक पिछड़ेपन के बजाय केवल आर्थिक स्थिति को आधार माना जाता है।
इस श्रेणी के लिए परिवार की वार्षिक आय एक निर्धारित सीमा से कम होना जरूरी है। साथ ही कृषि भूमि और आवासीय संपत्ति को लेकर भी नियम तय किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस कोटे की संवैधानिक वैधता को मंजूरी दे चुका है।
दिव्यांगजन आरक्षण का अलग ढांचा
दिव्यांगजन यानी PwD श्रेणी में आरक्षण सामाजिक या आर्थिक स्थिति से नहीं जुड़ा होता। सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए अलग आरक्षण का प्रावधान है। इसके लिए न्यूनतम 40 प्रतिशत प्रमाणित दिव्यांगता जरूरी होती है।
यह आरक्षण सभी श्रेणियों के भीतर लागू होता है और इसे क्षैतिज आरक्षण माना जाता है। इसका उद्देश्य शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे लोगों को समान अवसर उपलब्ध कराना है।
डोमिसाइल और मैनेजमेंट कोटा भी चर्चा में
राज्य सरकारों द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में स्थानीय छात्रों के लिए डोमिसाइल कोटा लागू किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवैधानिक रूप से मान्य माना है। इसके जरिए राज्यों को अपने निवासियों के लिए शिक्षा में प्राथमिकता देने का अधिकार मिलता है।
दूसरी ओर निजी संस्थानों में मैनेजमेंट कोटा की व्यवस्था भी लागू है। इसके तहत संस्थान सीमित सीटों पर अपने स्तर पर प्रवेश दे सकते हैं। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया है कि इस प्रक्रिया में न्यूनतम योग्यता और मेरिट के नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती।