उत्तर प्रदेश

BJPOrganization – उत्तर प्रदेश भाजपा में संगठनात्मक बदलाव की तैयारी तेज

BJPOrganization – उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में जल्द ही बड़े स्तर पर फेरबदल देखने को मिल सकता है। पार्टी के भीतर जिलों से लेकर क्षेत्रीय स्तर तक नई जिम्मेदारियों को लेकर मंथन जारी है। जहां एक ओर जिला इकाइयों के गठन की प्रक्रिया लगभग अंतिम चरण में पहुंच चुकी है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश नेतृत्व अब क्षेत्रीय अध्यक्षों और प्रदेश टीम में बदलाव की तैयारी कर रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि जिला इकाइयों के गठन के बाद जल्द ही क्षेत्रीय नेतृत्व से जुड़े फैसले भी सामने आ सकते हैं।

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जिला इकाइयों के गठन की प्रक्रिया अंतिम चरण में

भाजपा का संगठन उत्तर प्रदेश में व्यापक ढांचे के तहत काम करता है। प्रदेश में कुल 1918 मंडल, 98 संगठनात्मक जिले और छह क्षेत्रीय इकाइयाँ हैं। पार्टी ने अधिकांश मंडल और जिला स्तर के पदों पर नई नियुक्तियां कर दी हैं। फिलहाल करीब 70 से 75 मंडल अध्यक्षों की घोषणा बाकी है, जबकि 94 नए जिलाध्यक्ष पहले ही घोषित किए जा चुके हैं। अभी वाराणसी, चंदौली, देवरिया और अंबेडकर नगर जिलों में नए जिलाध्यक्षों की घोषणा होना शेष है और इसके लिए आंतरिक प्रक्रिया जारी है।

सूत्रों के अनुसार जिला इकाइयों के गठन को लेकर नियुक्त पर्यवेक्षकों ने संबंधित जिलों में कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं से रायशुमारी कर ली है। इन पर्यवेक्षकों को अपनी रिपोर्ट प्रदेश नेतृत्व को सौंपने के लिए लगभग दो दिन का समय दिया गया है। रिपोर्ट मिलने के बाद पार्टी नेतृत्व क्षेत्रवार बैठकों का दौर शुरू करेगा, जिसमें संगठनात्मक ढांचे को अंतिम रूप देने की दिशा में निर्णय लिए जाएंगे।

क्षेत्रीय अध्यक्षों की भूमिका पर बढ़ा ध्यान

पार्टी के भीतर अब सबसे अधिक चर्चा क्षेत्रीय अध्यक्षों के संभावित बदलाव को लेकर हो रही है। आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रीय नेतृत्व को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जिलों से आने वाले राजनीतिक फीडबैक और टिकट के संभावित दावेदारों की सूची भी क्षेत्रीय स्तर के जरिए ही प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचती है। ऐसे में यह पद रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में एक नया चलन भी देखने को मिला है, जिसमें क्षेत्रीय अध्यक्षों को बाद में विधान परिषद भेजा जाता रहा है। इस कारण यह पद राजनीतिक रूप से और अधिक प्रभावशाली माना जाने लगा है। परिणामस्वरूप पार्टी के भीतर इस जिम्मेदारी को लेकर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है और कई नेता इसके लिए प्रयासरत दिखाई दे रहे हैं।

शिकायतों के कारण बदलाव की चर्चा

पार्टी सूत्रों का कहना है कि वर्तमान क्षेत्रीय अध्यक्षों के खिलाफ विभिन्न स्तरों से कई तरह की शिकायतें भी सामने आई हैं। इनमें संगठनात्मक कामकाज में पक्षपात, कुछ खास लोगों को प्राथमिकता देने और समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा जैसे आरोप शामिल बताए जा रहे हैं। कुछ मामलों में लेन-देन से जुड़े आरोपों की चर्चा भी पार्टी नेतृत्व तक पहुंची है।

इन शिकायतों को देखते हुए नेतृत्व संगठन में व्यापक बदलाव पर विचार कर रहा है। चर्चा है कि छह में से अधिकांश क्षेत्रीय अध्यक्षों को बदला जा सकता है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा ही लिया जाएगा।

कुर्सी बचाने की कोशिशों में जुटे नेता

संभावित बदलाव की खबरों के बीच वर्तमान पदाधिकारी भी अपनी जिम्मेदारी बनाए रखने के प्रयास कर रहे हैं। पार्टी के भीतर यह चर्चा है कि कई क्षेत्रीय अध्यक्ष वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं और समर्थन जुटाने की कोशिश में लगे हैं। कुछ लोग राष्ट्रीय नेतृत्व तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश भी कर रहे हैं।

पार्टी के जानकारों का कहना है कि इस दौरान संगठन से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारियों और वैचारिक संगठनों से जुड़े लोगों से भी संपर्क साधा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि कुछ नेता अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अलग-अलग स्तरों पर प्रयास कर रहे हैं।

मिशन 2027 को ध्यान में रखकर रणनीति

पार्टी के भीतर चल रही इस कवायद का मुख्य लक्ष्य आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी माना जा रहा है। मिशन 2027 को ध्यान में रखते हुए भाजपा संगठनात्मक ढांचे को और मजबूत करना चाहती है। इसके लिए सामाजिक संतुलन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार इस बार संगठन में नियुक्तियों के दौरान सामाजिक समीकरणों को भी नए सिरे से देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि विभिन्न सामाजिक वर्गों और समुदायों को संगठनात्मक जिम्मेदारियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले। खासतौर पर उन वर्गों को भी जोड़ने की कोशिश की जा रही है जो हाल के कुछ चुनावों में पार्टी से दूरी बनाते नजर आए थे।

पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि मजबूत संगठनात्मक ढांचा ही चुनावी रणनीति की नींव होता है। इसलिए जिलों और क्षेत्रों में ऐसे नेताओं को जिम्मेदारी देने की योजना बनाई जा रही है जो स्थानीय स्तर पर सक्रिय हों और कार्यकर्ताओं के साथ बेहतर तालमेल रखते हों।

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