Climate Change Impact: पहाड़ों पर दिखा कुदरत का खतरनाक खेल, बर्फ की जगह बरस रही आग
Climate Change Impact: उत्तराखंड के पहाड़ों में इन दिनों कुदरत का एक अजीब और डरावना रूप देखने को मिल रहा है। जिस वक्त मसूरी, मुक्तेश्वर और नैनीताल जैसे इलाकों को बर्फ की सफेद चादर से ढका होना चाहिए था, वहां सूरज की तपिश लोगों को हैरान कर रही है। (Global Warming Effects) के इस दौर में पहाड़ों का तापमान सामान्य से छह डिग्री सेल्सियस ऊपर जा चुका है। दिसंबर और जनवरी के महीनों में जहां हाड़ कंपाने वाली ठंड होती थी, वहां अब चटख धूप ने सर्दियों के अहसास को पूरी तरह खत्म कर दिया है।

आसमान से नदारद बादल और पश्चिमी विक्षोभ की बेरुखी
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बार सर्दियों में बारिश की एक बूंद न गिरना और बर्फबारी का पूरी तरह गायब होना इस संकट की सबसे बड़ी वजह है। आमतौर पर सर्दियों में सक्रिय रहने वाला (Western Disturbance) इस साल बेहद कमजोर पड़ गया है, जिसके कारण पहाड़ों को नमी नहीं मिल पा रही है। जब तक बादलों की आवाजाही नहीं होगी और बारिश का दौर शुरू नहीं होगा, तब तक शुष्क मौसम का यह सिलसिला और तापमान में यह रिकॉर्ड उछाल थमने वाला नहीं है।
मसूरी और मुक्तेश्वर में टूटा गर्मी का पुराना रिकॉर्ड
भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो जनवरी के पहले पखवाड़े में मसूरी का जो औसत तापमान 10 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए था, वह अब 16 डिग्री के पार जा चुका है। मुक्तेश्वर में भी (Mountain Temperature Rise) की स्थिति भयावह है, जहां पारा 12 डिग्री के बजाय 18 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। नैनीताल जैसी ठंडी जगह पर भी औसत तापमान 17 डिग्री तक पहुंच गया है, जो सीधे तौर पर पर्यावरण में हो रहे बड़े बदलावों की ओर इशारा कर रहा है।
टिहरी और पिथौरागढ़ में भी सर्दी हुई बेअसर
पहाड़ों के वो जिले जो अपनी ठंडी तासीर के लिए जाने जाते हैं, वहां भी अब स्वेटर और जैकेट बोझ लगने लगे हैं। टिहरी और पिथौरागढ़ जैसे क्षेत्रों का तापमान (Climate Crisis in Himalayas) की गंभीरता को दर्शाते हुए 20 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। यह स्थिति सामान्य से दो से तीन डिग्री अधिक है। स्थानीय लोग भी इस बात से चिंतित हैं कि यदि जनवरी में यह हाल है, तो आने वाले मई-जून के महीनों में गर्मी क्या कहर ढाएगी।
मैदानी इलाकों में ठिठुरन और कोहरे का डबल अटैक
एक तरफ जहां ऊंचे पहाड़ तप रहे हैं, वहीं राज्य के मैदानी इलाके भीषण ठंड और कोहरे की चपेट में हैं। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में (Extreme Weather Conditions) की वजह से जनजीवन अस्त-व्यस्त है। यहां का तापमान पहाड़ों की तुलना में काफी कम रिकॉर्ड किया जा रहा है। 14 जनवरी को रुड़की में अधिकतम तापमान सामान्य से नौ डिग्री गिरकर महज नौ डिग्री सेल्सियस रह गया, जिसने पिछले कई सालों की ठंड का रिकॉर्ड तोड़ दिया है।
पहाड़ों से ज्यादा ठंडे हुए मैदान के शहर
मैदानी क्षेत्रों में धूप के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं और बर्फीली हवाओं ने लोगों को घरों में कैद कर दिया है। पंतनगर में तापमान सामान्य से पांच डिग्री कम यानी 14 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है। आश्चर्य की बात यह है कि (Winter Weather Patterns) इस बार इतने विचलित हैं कि पिथौरागढ़ जैसा पहाड़ी जिला 20 डिग्री पर है, जबकि मैदानी रुड़की 9 डिग्री पर सिमट गया है। यह तापमान का अंतर न केवल चौंकाने वाला है बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी खतरनाक साबित हो रहा है।
सूखे की मार और धधकते जंगलों का संकट
पहाड़ों में बारिश न होने का असर सिर्फ तापमान तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के बेशकीमती जंगल भी इसकी आग में झुलस रहे हैं। सर्दियों के मौसम में जंगलों का धधकना (Forest Fire Incidents) एक बड़ी चेतावनी है। पिछले दो महीनों के भीतर करीब 15 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो चुका है। आग की इन घटनाओं ने न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि इससे स्थानीय प्रदूषण और गर्मी में भी भारी इजाफा हुआ है।
वन्यजीवों और वन संपदा पर मंडराता खतरा
जंगलों में लग रही इस आग ने जैव विविधता के सामने संकट खड़ा कर दिया है। अब तक 25 से अधिक वनाग्नि की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जो (Environmental Degradation) की गति को तेज कर रही हैं। वन विभाग के लिए इस बेमौसमी आग पर काबू पाना एक बड़ी चुनौती बन गया है क्योंकि बारिश के अभाव में जमीन पूरी तरह सूख चुकी है और चीड़ की पत्तियां बारूद का काम कर रही हैं।
मसूरी और देहरादून के तापमान में खत्म हुआ अंतर
हैरानी की बात यह है कि पहाड़ों की रानी मसूरी और दून घाटी देहरादून के तापमान के बीच का अंतर अब लगभग खत्म हो गया है। 15 जनवरी को मसूरी का अधिकतम तापमान 20.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो (Temperature Anomaly) की श्रेणी में आता है। यह सामान्य से लगभग 10 डिग्री ज्यादा है। वहीं देहरादून में भी पारा 20 डिग्री के इर्द-गिर्द घूम रहा है। आमतौर पर मसूरी हमेशा देहरादून से काफी ठंडा रहता था, लेकिन इस बार मौसम के मिजाज ने सारे भूगोल बदल दिए हैं।
भविष्य की चिंता और पारिस्थितिक संतुलन
उत्तराखंड के पहाड़ों में दिख रहा यह बदलाव सिर्फ इस साल की घटना नहीं है, बल्कि यह हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन का संकेत है। यदि (Ecological Balance) को बनाए रखने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए और कार्बन उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगी, तो ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार और तेज हो जाएगी। वर्तमान में हो रहा यह तापमान परिवर्तन आने वाले जल संकट और कृषि चक्र के बिगड़ने की एक गंभीर आहट है जिसे समय रहते समझना होगा।



