उत्तराखण्ड

UPCLReport – कैग रिपोर्ट में बिजली नुकसान और वित्तीय अनियमितताओं का हुआ खुलासा

UPCLReport – उत्तराखंड में बिजली वितरण और शहरी विकास से जुड़ी योजनाओं को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। विधानसभा में प्रस्तुत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की इस रिपोर्ट में उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की कार्यप्रणाली और देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना में वित्तीय अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार बिजली प्रबंधन, बिलिंग व्यवस्था और परियोजनाओं के क्रियान्वयन में कई स्तरों पर लापरवाही सामने आई है, जिससे सरकारी धन और संसाधनों को नुकसान पहुंचा।

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रिपोर्ट में विशेष रूप से बिजली वितरण प्रणाली में बढ़े लाइन लॉस और परियोजनाओं में हुई वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर चिंता जताई गई है।

बिजली लाइन लॉस से करोड़ों का नुकसान

रिपोर्ट के अनुसार रुड़की, लक्सर और रुद्रपुर क्षेत्रों में बिजली वितरण के दौरान भारी लाइन लॉस दर्ज किया गया। वर्ष 2021-22 से 2023-24 के बीच इन इलाकों में लगभग 964 मिलियन यूनिट बिजली वितरण प्रक्रिया में ही नष्ट हो गई। इसके कारण करीब 488 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ।

ऑडिट में कहा गया है कि बिजली चोरी रोकने के लिए विशेष प्रकोष्ठ बनाने का निर्णय तो लिया गया था, लेकिन इसके लिए पर्याप्त पुलिस बल तैनात नहीं किया गया। इसके अलावा छापेमारी दल और राजस्व निरीक्षण इकाई को भी पूरी तरह सक्रिय नहीं किया जा सका। विशेषज्ञों के अनुसार यदि निगरानी व्यवस्था मजबूत होती तो लाइन लॉस को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता था।

बिना मीटर रीडिंग के जारी किए गए बिजली बिल

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को वास्तविक मीटर रीडिंग के बिना ही बिजली बिल जारी किए गए। वर्ष 2021-22 से 2023-24 के दौरान कुल मीटरों में से केवल लगभग 31 प्रतिशत की ही जांच की गई। इसके कारण एक लाख से अधिक उपभोक्ताओं को अनुमान के आधार पर बिल भेजे गए।

ऑडिट में यह भी सामने आया कि बकाया भुगतान करने में देरी करने वाले उपभोक्ताओं के कनेक्शन काटने की प्रक्रिया भी समय पर नहीं की गई। रिपोर्ट में यूपीसीएल के बिलिंग सिस्टम, वसूली व्यवस्था और निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया है कि वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से नियमित निरीक्षण पर्याप्त नहीं किए जा रहे थे।

स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में सामने आई अनियमितताएं

कैग की जांच में देहरादून स्मार्ट सिटी लिमिटेड की कई परियोजनाओं में वित्तीय अनियमितताएं सामने आई हैं। वर्ष 2018 से 2024 के बीच किए गए कार्यों के ऑडिट में करीब 75 करोड़ रुपये की गड़बड़ियों की ओर संकेत किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार कई परियोजनाओं में ठेकेदारों को अधिक भुगतान किया गया, जबकि कुछ कार्य ऐसे भी रहे जिन पर खर्च तो किया गया लेकिन उनका लाभ जनता तक नहीं पहुंच सका। कुछ मामलों में स्मार्ट सिटी की निर्धारित सीमा से बाहर भी कार्य कर दिए गए। इसके अलावा ठेकेदारों को दिए गए अग्रिम भुगतान की समय पर वसूली नहीं की जा सकी।

एडवांस भुगतान की वसूली नहीं हो सकी

ऑडिट रिपोर्ट में बताया गया है कि एरिया बेस्ड डेवलपमेंट क्षेत्र से बाहर लगभग 19 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए। ठेकेदार के साथ अनुबंध समाप्त होने के बाद भी लगभग 19.06 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान वापस नहीं लिया जा सका। इसे सरकारी धन के अनुचित उपयोग का उदाहरण बताया गया है।

इसके अलावा मोबिलाइजेशन एडवांस पर ब्याज की गणना में त्रुटि के कारण करीब 81 लाख रुपये की कम वसूली हुई। परियोजना की धनराशि को बचत खाते के बजाय चालू खाते में रखने से लगभग 6 करोड़ रुपये से अधिक ब्याज का संभावित नुकसान भी हुआ।

स्मार्ट स्कूल और अन्य परियोजनाओं में भी खामियां

रिपोर्ट में स्मार्ट स्कूल परियोजना से जुड़े खर्चों पर भी सवाल उठाए गए हैं। इस योजना के तहत लगभग 5.91 करोड़ रुपये खर्च कर तीन स्कूलों में कंप्यूटर लैब और स्मार्ट बोर्ड लगाए गए, लेकिन बिजली बिल का भुगतान नहीं होने के कारण उपकरणों का उपयोग नहीं हो सका और वे लंबे समय तक निष्क्रिय पड़े रहे।

इसी तरह पर्यावरण निगरानी के लिए लगाए गए सेंसर भी राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए। लगभग 2.62 करोड़ रुपये की लागत से लगाए गए इन उपकरणों से प्राप्त डेटा उपयोगी नहीं रहा। इसके अलावा ई-रिक्शा और ई-बस चार्जिंग स्टेशनों पर भी करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन वे लंबे समय तक इस्तेमाल में नहीं आ सके।

संस्थागत व्यवस्थाओं पर भी उठे सवाल

रिपोर्ट में कुछ अन्य सरकारी संस्थानों की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की गई है। उदाहरण के तौर पर उत्तराखंड बीज एवं तराई विकास निगम में वर्ष 2022-23 के दौरान बोर्ड की अनिवार्य बैठकें आयोजित नहीं की गईं, जबकि नियमों के अनुसार साल में कम से कम चार बैठकें होना जरूरी है।

इसके अलावा पूर्व सैनिक कल्याण निगम के बोर्ड में किसी महिला सदस्य की नियुक्ति नहीं होने का भी उल्लेख किया गया है। ऑडिट रिपोर्ट में इन संस्थानों की प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता बताई गई है।

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