बिज़नेस

AsiaEconomy – पश्चिम एशिया तनाव से एशिया-प्रशांत वृद्धि पर बढ़ा दबाव

AsiaEconomy – पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबी खिंचती है, तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र की आर्थिक रफ्तार धीमी पड़ सकती है और महंगाई में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है। मौजूदा हालात ऊर्जा कीमतों में उछाल, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और वैश्विक व्यापार में बाधाओं के रूप में सामने आ रहे हैं, जिनका सीधा असर विकास दर पर पड़ने की आशंका है।

asia economy west asia growth pressure

ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भरता बढ़ा रही जोखिम

रेटिंग एजेंसियों की रिपोर्ट बताती है कि एशिया के कई देश सीधे तौर पर पश्चिम एशिया से व्यापार पर निर्भर नहीं हैं, लेकिन ऊर्जा आयात के कारण उनकी संवेदनशीलता अधिक है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व यहां अहम हो जाता है, जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति गुजरती है। इस मार्ग पर किसी भी तरह की रुकावट का असर एशियाई देशों पर तेजी से पड़ सकता है, क्योंकि उनकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी पर निर्भर है।

शिपिंग और कीमतों में उतार-चढ़ाव

मौजूदा तनाव के चलते समुद्री परिवहन प्रभावित हुआ है, जिससे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला। कुछ समय के लिए कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जिसने बाजार में चिंता बढ़ा दी। इसके साथ ही वित्तीय बाजारों में भी अस्थिरता देखी गई, जहां शेयर बाजारों में गिरावट और बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी दर्ज की गई। विशेषज्ञों का सुझाव है कि ऊर्जा कीमतों को पूरी तरह नियंत्रित करने के बजाय सीमित रूप से बढ़ने दिया जाए, ताकि खपत में संतुलन आए और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को प्रोत्साहन मिल सके।

लंबा संकट आर्थिक गतिविधियों को कर सकता है प्रभावित

इक्रा सहित अन्य एजेंसियों का मानना है कि यदि यह संघर्ष जल्द समाप्त होता है तो इसका असर सीमित रह सकता है। हालांकि, लंबी अवधि तक तनाव बने रहने की स्थिति में आर्थिक गतिविधियों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। एशियाई विकास बैंक ने सरकारों को सलाह दी है कि वे आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए ऊर्जा खपत पर नियंत्रण और वैकल्पिक स्रोतों के विकास पर ध्यान दें। साथ ही, व्यापक सब्सिडी के बजाय लक्षित सहायता योजनाओं को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई गई है।

रेमिटेंस और आपूर्ति शृंखला पर दबाव

क्रिसिल की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि शिपिंग में बाधा आने से परिवहन लागत बढ़ेगी और उत्पादन में देरी हो सकती है। इसका असर आपूर्ति शृंखला पर पड़ेगा और कई देशों के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी। इसके अलावा, खाड़ी देशों में आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती आने की स्थिति में वहां काम कर रहे प्रवासी कामगारों की आय प्रभावित हो सकती है, जिससे भारत सहित कई देशों में आने वाला विदेशी धन घट सकता है।

भारत और दक्षिण एशिया पर संभावित असर

विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस स्थिति का असर दक्षिण एशिया, खासकर भारत पर महंगाई के रूप में ज्यादा दिख सकता है। ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से सरकार के खर्च में इजाफा हो सकता है, खासतौर पर उर्वरक और एलपीजी जैसी आवश्यक सब्सिडी पर। इससे वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर दबाव बढ़ने की संभावना है। एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क के अनुसार, लंबे समय तक संकट बने रहने पर देशों को कम वृद्धि और उच्च महंगाई के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

Related Articles

Back to top button

Adblock Detected

Please remove AdBlocker first, and then watch everything easily.