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CancerCare – आयुष्मान योजना से विशेषज्ञ डॉक्टर हटने पर बढ़ी चिंता, जानें विस्तार में…

CancerCare – भारत में कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और हर साल करीब 15 लाख नए मरीज सामने आ रहे हैं। ऐसे समय में जब स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से दबाव में है, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना से सैकड़ों कैंसर विशेषज्ञों को हटाए जाने का मामला नई चिंता पैदा कर रहा है। इस फैसले का सीधा असर उन मरीजों पर पड़ सकता है, जो इलाज के लिए सरकारी योजनाओं पर निर्भर हैं।

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डिग्री मान्यता को लेकर लिया गया निर्णय
जानकारी के अनुसार, जिन डॉक्टरों को योजना के पैनल से हटाया गया है, उनके पास पर्याप्त अनुभव और प्रशिक्षण तो है, लेकिन उनके पास नेशनल मेडिकल कमिशन से मान्यता प्राप्त डिग्री नहीं है। इनमें कई ऐसे चिकित्सक शामिल हैं, जिन्होंने फेलोशिप के माध्यम से विशेषज्ञता हासिल की है और वर्षों से कैंसर के मरीजों का इलाज कर रहे हैं।

स्वास्थ्य प्राधिकरण का तर्क है कि मानकीकरण बनाए रखने के लिए यह कदम जरूरी है। हालांकि, इस निर्णय ने चिकित्सा समुदाय के भीतर बहस को जन्म दे दिया है।

डॉक्टरों ने फैसले पर जताई आपत्ति
इस फैसले के खिलाफ कई विशेषज्ञ डॉक्टरों ने आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि कुछ दशक पहले तक ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में औपचारिक डिग्री कोर्स सीमित थे और फेलोशिप ही विशेषज्ञ बनने का मुख्य माध्यम हुआ करती थी।

डॉक्टरों का यह भी कहना है कि आज भी पोस्टग्रैजुएशन के बाद कई चिकित्सक बड़े कैंसर संस्थानों में दो से तीन साल तक प्रशिक्षण लेते हैं, जहां उन्हें सर्जरी और उपचार की गहन जानकारी मिलती है। ऐसे में केवल डिग्री के आधार पर उन्हें बाहर करना उचित नहीं माना जा रहा।

मरीजों पर पड़ सकता है सीधा असर
इस निर्णय का सबसे बड़ा प्रभाव उन मरीजों पर पड़ सकता है, जो आयुष्मान योजना के तहत इलाज कराते हैं। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग, जो निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते, उन्हें विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

भारत में पहले से ही कैंसर विशेषज्ञों की संख्या सीमित है। एक अनुमान के अनुसार, देश में हर 10 लाख लोगों पर केवल एक कैंसर डॉक्टर उपलब्ध है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में डॉक्टरों को पैनल से बाहर किया जाता है, तो इलाज की उपलब्धता और प्रभावित हो सकती है।

कई वरिष्ठ डॉक्टर भी सूची से बाहर
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस फैसले से प्रभावित डॉक्टरों में कई अनुभवी और प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं। इनमें विभागाध्यक्ष, वरिष्ठ सर्जन, मेडिकल डायरेक्टर और शिक्षण संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञ भी हैं।

करीब 300 डॉक्टरों को पैनल से हटाए जाने की बात सामने आई है, जो कुल उपलब्ध विशेषज्ञों की संख्या के हिसाब से एक बड़ा हिस्सा माना जा रहा है। इससे चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच दोनों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

छोटे शहरों में बढ़ सकती है दिक्कत
टियर-2 और टियर-3 शहरों में पहले से ही विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी रहती है। ऐसे इलाकों में मरीज सीमित विकल्पों पर निर्भर होते हैं। यदि पैनल से डॉक्टरों की संख्या घटती है, तो इन क्षेत्रों में इलाज और मुश्किल हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे पर संतुलित समाधान निकालना जरूरी है, ताकि गुणवत्ता और पहुंच दोनों को बनाए रखा जा सके। फिलहाल यह मामला स्वास्थ्य नीति और मरीजों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती के रूप में सामने आया है।

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