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Defection Law – राघव चड्ढा के कदम से फिर चर्चा में दल-बदल नियम…

Defection Law – राज्यसभा में हाल ही में सामने आए एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम ने दल-बदल कानून पर नई बहस छेड़ दी है। आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे राघव चड्ढा ने छह अन्य सांसदों के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का फैसला किया है। इस कदम ने न सिर्फ राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित किया है, बल्कि उस कानून की सीमाओं को भी उजागर किया है, जिसे खुद चड्ढा कभी और सख्त बनाना चाहते थे। मौजूदा नियमों के तहत, अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद एक साथ दल बदलते हैं, तो उनकी सदस्यता सुरक्षित रहती है।

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दो-तिहाई नियम से सुरक्षित रही सदस्यता

राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सदस्य हैं। ऐसे में सात सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना कानूनी तौर पर वैध माना जाता है, क्योंकि यह संख्या दो-तिहाई से अधिक है। इसी प्रावधान का हवाला देते हुए चड्ढा और उनके साथियों ने पार्टी बदलने का निर्णय लिया। इस नियम के कारण उन पर दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता लागू नहीं होती, जिससे उनकी संसदीय सदस्यता बरकरार रहती है।

पुराने प्रस्ताव ने बढ़ाई चर्चा

इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि राघव चड्ढा ने अपने शुरुआती संसदीय कार्यकाल में इसी कानून को और सख्त बनाने का प्रस्ताव रखा था। अगस्त 2022 में उन्होंने एक निजी विधेयक पेश किया था, जिसमें दल-बदल की शर्तों को कड़ा करने की बात कही गई थी। उस समय उन्होंने तर्क दिया था कि मौजूदा कानून में कई कमियां हैं, जिनके चलते राजनीतिक दलों में टूट-फूट और विधायकों की खरीद-फरोख्त जैसी समस्याएं बनी रहती हैं।

क्या बदलाव सुझाए गए थे

चड्ढा के प्रस्तावित विधेयक में दल-बदल की सीमा को दो-तिहाई से बढ़ाकर तीन-चौथाई करने का सुझाव दिया गया था। यानी अगर यह प्रस्ताव लागू हो जाता, तो किसी पार्टी के 75 प्रतिशत सांसदों की सहमति के बिना दल बदलना संभव नहीं होता। इसके अलावा, उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि दल बदलने वाले जनप्रतिनिधियों पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए, ताकि ऐसे कदमों को हतोत्साहित किया जा सके।

रिसॉर्ट राजनीति पर रोक की बात

विधेयक में यह भी प्रस्ताव था कि यदि कोई जनप्रतिनिधि सरकार से समर्थन वापस लेता है, तो उसे सात दिनों के भीतर सदन के अध्यक्ष के सामने पेश होना होगा। ऐसा न करने पर उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है। इस प्रावधान का उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता और तथाकथित रिसॉर्ट राजनीति को नियंत्रित करना बताया गया था।

संवैधानिक संशोधन का प्रस्ताव

इस बिल के जरिए संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 के साथ-साथ दसवीं अनुसूची में संशोधन की मांग की गई थी। इन प्रावधानों का संबंध संसद और विधानसभाओं के सदस्यों की अयोग्यता से जुड़ा है। चड्ढा का कहना था कि इन बदलावों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जा सकता है।

वर्तमान स्थिति और सवाल

हालांकि यह विधेयक अब तक पारित नहीं हो पाया है और लंबित है। मौजूदा स्थिति में वही दो-तिहाई नियम लागू है, जिसका उपयोग अब चड्ढा और उनके सहयोगियों ने किया है। इस घटनाक्रम ने यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या वर्तमान दल-बदल कानून पर्याप्त है या इसमें सुधार की जरूरत है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के मामलों से कानून की सीमाएं सामने आती हैं और भविष्य में इसे लेकर व्यापक चर्चा संभव है।

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