CensusHistory – चांदनी रात में पूरी हुई थी हैदराबाद की पहली जनगणना
CensusHistory – देश में जनगणना 2027 के पहले चरण की शुरुआत के साथ ही भारत की पहली जनगणना से जुड़ी एक दिलचस्प ऐतिहासिक घटना फिर चर्चा में आ गई है। आज जहां डिजिटल तकनीक और ऑनलाइन स्व-गणना जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं इस्तेमाल की जा रही हैं, वहीं 1881 में हैदराबाद रियासत में जनगणना एक बेहद अलग और अनोखे तरीके से पूरी की गई थी। उस दौर में बिजली की सुविधा नहीं थी, इसलिए पूरी प्रक्रिया चांदनी रात के सहारे संपन्न कराई गई थी।

17 फरवरी 1881 की रात को हैदराबाद में पहली बार व्यापक जनगणना अभियान चलाया गया था। प्रशासन ने इसे केवल एक रात के भीतर पूरा कर लिया था। इतिहासकारों के अनुसार, उस समय यह अपने आप में एक बड़ी प्रशासनिक उपलब्धि मानी गई थी।
चांद की रोशनी में हुआ था सर्वेक्षण
उस दौर में बिजली उपलब्ध नहीं होने के कारण अधिकारियों को जनगणना के लिए अलग रणनीति बनानी पड़ी। इसी वजह से तारीख का चयन इस तरह किया गया कि रात में पर्याप्त चांदनी मिल सके। जनगणना का आयोजन शुक्ल पक्ष के दौरान किया गया ताकि गणना करने वाले कर्मचारियों और स्वयंसेवकों को रोशनी की दिक्कत न हो।
रिपोर्टों के मुताबिक, अधिकारी और स्वयंसेवक लोगों के घरों तक जाकर उनकी जानकारी दर्ज कर रहे थे। कई जगह लोगों को उनके सोने के स्थानों पर ही चिन्हित किया गया ताकि किसी व्यक्ति की गिनती छूट न जाए। यह पूरी प्रक्रिया बेहद संगठित तरीके से संचालित की गई थी।
बिना वेतन के जुटे थे स्वयंसेवक
उस समय इतने बड़े स्तर पर जनगणना कराना आसान नहीं था। प्रशासन ने पेशेवर अधिकारियों के साथ पढ़े-लिखे स्थानीय स्वयंसेवकों की भी मदद ली थी। खास बात यह थी कि कई स्वयंसेवकों ने बिना किसी पारिश्रमिक के इस अभियान में योगदान दिया।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस पूरी जनगणना प्रक्रिया पर करीब 1.97 लाख रुपये खर्च किए गए थे, जो उस समय के हिसाब से बड़ी राशि मानी जाती थी। अधिकारियों ने यह भी सुनिश्चित किया था कि जनगणना का समय किसी बड़े धार्मिक आयोजन, मेले या त्योहार से न टकराए ताकि लोगों की सामान्य दिनचर्या प्रभावित न हो।
आज की जनगणना से बिल्कुल अलग था तरीका
आज देश में जनगणना के लिए डिजिटल पोर्टल, मोबाइल एप और सेल्फ-एन्युमरेशन जैसी सुविधाओं का उपयोग किया जा रहा है। कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लोग स्वयं भी अपनी जानकारी ऑनलाइन दर्ज कर सकते हैं। इसके मुकाबले 1881 की व्यवस्था पूरी तरह मानवीय श्रम और स्थानीय संसाधनों पर आधारित थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि उस समय उपलब्ध सीमित साधनों के बावजूद इतनी बड़ी आबादी का रिकॉर्ड तैयार करना प्रशासनिक दृष्टि से बड़ी उपलब्धि थी। यह घटना भारत में जनगणना व्यवस्था के शुरुआती विकास को भी दर्शाती है।
145 वर्षों में कई गुना बढ़ी आबादी
ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, हैदराबाद की आबादी पिछले करीब 145 वर्षों में कई गुना बढ़ चुकी है। 1881 में शहर की जनसंख्या लगभग 3.67 लाख दर्ज की गई थी, जबकि आज यह संख्या करोड़ों तक पहुंच चुकी है। तेजी से शहरीकरण, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार ने शहर की आबादी में लगातार वृद्धि की है।
इतिहासकारों का मानना है कि 1881 की वह जनगणना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि उस दौर की सामाजिक और तकनीकी परिस्थितियों का भी महत्वपूर्ण दस्तावेज है। चांदनी रात में पूरी हुई यह जनगणना आज भी हैदराबाद के इतिहास का एक अनोखा अध्याय मानी जाती है।