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Litigation – कच्छ गोचर भूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी

Litigation – कच्छ की बहुचर्चित गोचर भूमि विवाद से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को खारिज करते हुए अदालत की प्रक्रिया पर सवाल उठाने को गंभीर मामला माना है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हस्ताक्षरित आदेश ही अंतिम और वैध माना जाता है, जबकि खुली अदालत में बोला गया मसौदा केवल प्रारंभिक रूप होता है। कोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ताओं पर 2-2 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

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मौखिक और लिखित आदेश को लेकर उठा विवाद

यह मामला कच्छ जिले की चरागाह भूमि से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि सुनवाई के दौरान अदालत ने जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने की बात कही थी। उनका कहना था कि बाद में जारी अंतिम आदेश में इस हिस्से को हटा दिया गया। साथ ही गुजरात हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका को भी समाप्त कर दिया गया, जिससे अडानी पोर्ट्स को राहत मिली।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि मौखिक टिप्पणी और लिखित आदेश के बीच महत्वपूर्ण अंतर है। इस दलील के समर्थन में उन्होंने मीडिया रिपोर्ट, यूट्यूब वीडियो और अन्य दस्तावेजों का हवाला दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने दलीलों को बताया निराधार

जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने साफ कहा कि अदालत में सुनवाई के दौरान जो प्रारंभिक आदेश बोला जाता है, वह अंतिम निर्णय नहीं होता। कोर्ट के अनुसार, आदेश को बाद में विधिक और भाषाई रूप से परखा जाता है और आवश्यक सुधारों के बाद ही उस पर हस्ताक्षर किए जाते हैं।

पीठ ने कहा कि हस्ताक्षरित आदेश अदालत की अंतिम राय को दर्शाता है और उसी को मान्यता प्राप्त होती है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अधूरे वीडियो या बाहरी रिपोर्ट के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया पर संदेह जताना उचित नहीं है।

अदालत ने कार्यप्रणाली को भी समझाया

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी बताया कि संवैधानिक अदालतों में मामलों की संख्या काफी अधिक होती है। जिस दिन इस मामले की सुनवाई हुई, उस दिन पीठ के सामने दर्जनों मामले सूचीबद्ध थे। ऐसे में समय बचाने के लिए खुली अदालत में संक्षिप्त ड्राफ्ट बोला जाता है और बाद में चेंबर में उसे विस्तार से तैयार कर अंतिम रूप दिया जाता है।

कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया न्यायिक व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है और इसे किसी प्रकार की अनियमितता के रूप में नहीं देखा जा सकता।

2005 से जुड़ा है पूरा मामला

यह विवाद वर्ष 2005 में शुरू हुआ था, जब कच्छ के नवीनल गांव में लगभग 231 हेक्टेयर गोचर भूमि मुंद्रा पोर्ट परियोजना के लिए आवंटित की गई थी। बाद में यही कंपनी अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड लिमिटेड के नाम से जानी गई। ग्रामीणों और स्थानीय पक्षों ने इस आवंटन को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

जुलाई 2024 में गुजरात सरकार ने 108 हेक्टेयर से अधिक भूमि वापस लेने का आदेश जारी किया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने भी भूमि वापसी की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के निर्देश दिए थे। अडानी पोर्ट्स ने इस कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा था कि उनका पक्ष सुने बिना आदेश जारी किया गया।

पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी रोक

इस मामले में जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी। बाद में मामला जस्टिस माहेश्वरी और जस्टिस चंदुरकर की पीठ के समक्ष पहुंचा, जहां मौखिक और लिखित आदेश को लेकर नया विवाद सामने आया।

अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक आदेशों की वैधता केवल हस्ताक्षरित दस्तावेज से तय होती है और अदालत की प्रक्रिया पर बिना पर्याप्त आधार के सवाल उठाना स्वीकार्य नहीं है।

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